यूपी के हरदोई में एक प्राइवेट स्कूल के टीचर को अरेस्ट किया गया है. टीचर पर आरोप है कि उसने 10 साल के  छात्र की पिटाई की जिससे उसके पैर की हड्डी टूट गई. बताया यह भी जा रहा है कि जब कक्षा 3 के छात्र की मां ने शिक्षक से इस बारे में पूछा तो उसने उसके इलाज के लिए 200 रुपये देने की पेशकश की. दरअसल हुआ कुछ यूं था कि माटसाब ने क्लासरूम में कोई सवाल पूछा. सवाल शायद टफ था जिसका जवाब देने में छात्र विफल रहा और नतीजा ये निकला कि 'सर' को गुस्सा आ गया और फिर वो हुआ जो सोच और कल्पना से परे है. 

बताया जा रहा है कि छात्र से नाराज शिक्षक हर्षित तिवारी ने कथित तौर पर उसे जातिवादी गालियां दीं और उसके बाद उसकी जबरदस्त पिटाई कर दी.  हालात कुछ ऐसे बिगड़े की लड़के का संतुलन बिगड़ गया और उसके पैर की हड्डी टूट गई. मामले में दिलचस्प ये रहा कि टीचर ने लड़के के इलाज के लिए पैसों की पेशकश की. 

बच्चे की मां को टीचर की ये हरकत नागवार गुजरी और उसने शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने भी महिला की इस शिकायत पर त्वरित एक्शन लिया और आरोपी शिक्षक को बीएनएस की धारा 151 के तहत गिरफ्तार कर लिया.

यक़ीनन इस मामले में गलती टीचर की है, और एक मासूम बच्चे के साथ किये गए इस ह्रदय विदारक कृत्य के लिए उसे सजा मिलनी ही चाहिए. लेकिन जब हम इस पूरे मामले को देखें और टीचर की मनोस्थिति का अवलोकन करें तो मिलता है कि टीचर यदि बेकाबू हुआ तो इसमें बतौर समाज गलती हमारी ही है.  

शायद ये बातें आजकल के पैंपर्ड बच्चे न समझ पाएं. मगर वो लोग जिनका जन्म 80 और 90 के दशक में हुआ है. वो इस बात को बखूबी समझ सकते हैं कि कैसे इन मरकहे टीचर्स ने उनके बचपन का पुदीना किया हुआ था. 

कैसे टीचर्स 80 और 90 के दौर के बच्चों के डर का पर्याय हुआ करते थे? दिलचस्प ये कि तब अगर बच्चा टीचर को देखकर खौफ खाता था तो उसकी वजह और कोई नहीं बल्कि उसके खुद के माता पिता होते थे. जी हां बिलकुल सही सुन रहे हैं आप.  तब उस दौर में उस टीचर को टीचर ही नहीं समझा जाता था जो बच्चे पर हाथ न छोड़े, उन्हें मारे नहीं. 

ध्यान रहे तब कई मौके ऐसे भी आते थे जब टीचर बच्चे को धुन देते थे और जब कोई उनसे पूछे तो या तो उन्हें याद नहीं रहता था. या फिर वो इसे मैच से पहले की नेट प्रैक्टिस की संज्ञा देते थे. 

जिक्र टीचर्स के मरकहे होने और मां बाप का हुआ है. तो 80 या 90 के दशक में जन्में लोगों से बात की जाए तो मिलता है कि कई बार तो खुद किसी बच्चे के माता या पिता टीचर्स को ये बताते थे कि कैसे उसे उनके बच्चे को मार मारकर उनका भूत निकालना है. 

बच्चा पास हो, फेल हो इससे कोई मतलब नहीं रहता था. मुद्दा था उसे मारना और इतना मारना कि वो सुधर जाए.  खैर अब दौर बदल चुका है मां बाप भी समझ चुके हैं कि मार पिटाई से केवल बच्चे बर्बाद होते और कई मौकों पर अवसाद में जाते हैं. 

बहरहाल जिक्र हरदोई के मामले का हुआ है. तो शायद बच्चे के पैर की हड्डी तोड़ने के बाद सलाखों के पीछे पहुंचा टीचर इस बात को समझ गया होगा कि ये 80 या 90 का दशक नहीं, बल्कि 2025 है.

टीचर जान चुका होगा कि ये वो वक़्त है जब मां बाप अपने बच्चे को नंबर लाने की मशीन नहीं. बल्कि एक इंसान समझने लग गए हैं और जानते हैं कि उसकी बेहतरी के लिए वास्तव में उन्हें और टीचर्स को क्या करना चाहिए. 

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In UP Hardoi 10 year old boy beaten by teacher mother confronted he offered Rs 200 for his medical treatment
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हड्डी तोड़ने वाले टीचर को आज सजा हुई, 80-90 का दौर होता तो सीन दूसरा रहता!
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हरदोई में जो टीचर ने अपने 10 साल के स्टूडेंट के साथ किया वो कई मायनों में निंदनीय है
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Satire: हड्डी तोड़कर पैसे देने वाला टीचर को आज सजा हुई, 80-90 का दौर होता तो सीन दूसरा रहता!

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