बिहार की सियासत में बदलाव की आहट है. दशकों से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे तीन बड़े समाजवादी नेता- लालू यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार अब बैकग्राउंड में हैं. उनकी जगह अब बेटों ने कमान संभाल ली है या उसकी तैयारी कर रहे हैं. लालू के बेटे तेजस्वी यादव अब राजद के सबसे बड़े नेता हैं. रामविलास पासवान के बेटे चिराग अपनी पार्टी के सर्वेसर्वा होने के साथ सांसद और केंद्र में मंत्री भी हैं. नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने राजनीति में औपचारिक एंट्री तो नहीं ली है, लेकिन बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच बिहार के मुख्यमंत्री को भी अपनी विरासत की चिंता सताने लगी है. हाल के दिनों में निशांत की बढ़ी सियासी सक्रियता भी ये संकेत दे रही है कि इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में जेडीयू के प्रचार अभियान में उनकी भूमिका बड़ी होने वाली है. करीब पांच दशक पहले लालू, नीतीश और रामविलास ने परिवारवाद के खिलाफ समाजवाद के रथ पर सवार होकर बिहार में एक नई राजनीति की शुरुआत की थी. करीब 50 साल बाद इन तीनों नेताओं की सियासत 360 डिग्री घूम चुकी है और अब वे उसी परिवारवाद के सहारे हैं. ये कितना सही या गलत है, इसकी चर्चा फिर कभी लेकिन फिलहाल इसका एक नतीजा अच्छा हो सकता है. इस बार के चुनाव में बिहार को नया नेतृत्व मिल सकता है.
सभी दलों में यूथ लीडरशिप
बिहार विधानसभा चुनाव में सभी प्रमुख दलों की कमान युवा नेताओं के हाथों में रहने की संभावना है. राजद के तेजस्वी यादव, लोजपा (आर) के चिराग पासवान और जेडीयू के निशांत कुमार अपने-अपने पिताओं की राजनीतिक विरासत बचाने के लिए मैदान में उतरेंगे. जन सुराज के प्रशांत किशोर यानी पीके पहले से ही चुनावी रणभूमि में उतर चुके हैं. बाकी दलों की देखादेखी कांग्रेस भी कन्हैया कुमार को आगे कर चुनावी रणनीति बनाने की तैयारी कर रही है. भाजपा इस दौड़ में फिलहाल थोड़ी पीछे दिख रही है, लेकिन युवा चेहरे के रूप में डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी का विकल्प उसके पास मौजूद है.
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58% आबादी युवाओं की
सभी पार्टियों में युवा नेतृत्व को आगे करने की इच्छा के पीछे ठोस राजनीतिक वजह हैं. बिहार की कुल आबादी करीब 15 करोड़ है. इनमें से करीब 58 प्रतिशत 25 साल से कम उम्र के हैं. ये वो पीढ़ी है जिसने मंडल और मंदिर आंदोलन को अपनी आंखों से नहीं देखा. इसलिए वे जाति और धर्म की राजनीति को उतना महत्व नहीं देते जितना पुरानी पीढ़ियां देती थीं. इस पीढ़ी के मुद्दे भी अलग हैं. सोशल मीडिया में रची-बसी ये पीढ़ी मंदिर-मस्जिद में नहीं उलझती, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे उन्हें ज्यादा रास आते हैं.
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हावी हैं शिक्षा-रोजगार के मुद्दे
2020 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में तेजस्वी यादव ने इस ट्रेंड को पहचाना था. उन्होंने रोजगार और पलायन के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया और इसका फायदा भी उन्हें मिला. यही कारण है कि सीएम नीतीश कुमार भी अपने भाषणों में लाखों नौकरियां देने की बात बार-बार कर रहे हैं. कांग्रेस ने कन्हैया कुमार के नेतृत्व में पदयात्रा शुरू की है. इसका मुख्य मुद्दा भी शिक्षा और रोजगार ही है.
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नतीजों पर टिकी निगाहें
इतना तो स्पष्ट है कि इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में चेहरे नए होंगे, रणनीति अलग होगी और मुद्दे पहले से अलग होंगे. सवाल ये है कि क्या इस सबका नतीजा नए नेतृत्व के रूप में सामने आएगा. इस बारे में फिलहाल कुछ भी कहना मुश्किल है. यह काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिलती हैं. राजद को अपने दम पर बहुमत मिला तो तेजस्वी यादव का सीएम बनना तय है. निशांत कुमार की सियासी डेब्यू के बाद जेडीयू में नेता पद के वो बड़े दावेदार होंगे, लेकिन पार्टी के पुराने नेताओं को वो कितने स्वीकार्य होंगे, यह देखना रोचक होगा. बीजेपी का मामला थोड़ा उलझा हुआ है क्योंकि पार्टी ने हाल ही में सम्राट चौधरी की जगह दिलीप जयसवाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. हालांकि, इसका ये मतलब नहीं है कि वे चुनाव में पार्टी का चेहरा होंगे. बीजेपी को बहुमत मिला तो कोई आश्चर्य नहीं कि किसी कम चर्चित चेहरे को विधायक दल का नेता चुन लिया जाए. मतलब साफ है कि बिहार एक बड़े सियासी बदलाव के मुहाने पर खड़ा है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर चीज वोट के तराजू पर तौली जाती है. यदि ईवीएम के नतीजे अनुमानों पर खरे उतरे तो सरकार चाहे किसी भी पार्टी या गठबंधन की बने, लेकिन सूबे के सियासी पटल पर नए युवा नेतृत्व की ताजपोशी करीब-करीब तय है.
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Bihar Politics: तेजस्वी, चिराग, निशांत, कन्हैया, पीके... क्या इस बार बिहार को मिलेगा युवा नेतृत्व?