भगवान श्री राम ने रावण का वध कर उसके अहंकार को समाप्त किया और बुराई पर अच्छाई की जीत हुई. ऐसा कहा जाता है कि सीता में ऐसी दिव्य शक्ति थी कि वह रावण का नाश कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. वह राम का इंतज़ार क्यों करती रहीं?  
 
विवाह के बाद जब जानकी ने पहली बार अयोध्या की धरती पर कदम रखा तो रघुवंश की परंपरा के अनुसार दुल्हन के लिए मीठे व्यंजन तैयार करने की प्रथा का पालन किया गया. माता सीता ने प्रेम और भक्ति के साथ खीर तैयार की. जिसकी खुशबू पूरे महल में फैल गई. उसी समय तेज हवा का झोंका आया और घास का एक छोटा सा तिनका उड़कर सीधे महाराज दशरथ की गोद में जा गिरा.

सीता की नजर उस पर पड़ी और उसने सोचा कि इसे हाथों से हटाना उचित नहीं होगा. एक क्षण के लिए उसकी आंखों में चिंता की लहर दौड़ गई, लेकिन अगले ही क्षण उसे दिव्य दर्शन हुए. एक ऐसा रूप जो करुणा, प्रतिभा और आश्चर्य का अद्भुत मिश्रण था. नांद में गिरा भूसा कुछ ही क्षणों में जलकर राख हो गया.
 
इस अद्भुत घटना के साक्षी केवल राजा दशरथ ही थे. भोजन के बाद जब सभी चले गए तो उसने सीता को अपने कमरे में बुलाया. उनकी आंखों में आश्चर्य और सम्मान का भाव था. उन्होंने सीता से कहा, “हे देवी, आज मैंने आपकी अद्भुत शक्ति देखी है. आपके पास जो शक्ति है वह अलौकिक है.”

इस प्रकार राजा दशरथ ने सीता को उनकी अपार शक्ति का अहसास कराया. वह चाहतीं तो रावण का अपहरण करते समय उसे अपनी एक दृष्टि से ही नष्ट कर सकती थीं. अशोक वाटिका में कैद रहते हुए भी, उनमें रावण को दण्ड देने की शक्ति थीं. फिर भी, वह ऐसा नहीं कीं. इसके पीछे कई कारण हैं.

मर्यादा और धर्म का पालन: माता सीता मर्यादा की प्रतिमूर्ति थीं. वह जानती थी कि भगवान राम के हाथों रावण की मृत्यु निश्चित है. इसलिए धर्म और मर्यादा के सम्मान के लिए उन्होंने स्वयं कोई कार्रवाई नहीं की. वह अपने पति के प्रति अडिग रहीं और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश करने के बजाय भगवान राम की प्रतीक्षा करना चुना.
 
श्राप का परिणाम: एक पौराणिक कथा के अनुसार, रावण को नलकुबेर ने श्राप दिया था कि यदि वह किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा तो उसका सिर सौ टुकड़ों में कट जाएगा. इस श्राप के कारण रावण सीता को छूने से भी डरता था. सीता इस श्राप से अवगत थीं और जानती थीं कि रावण उन्हें कोई शारीरिक क्षति नहीं पहुंचा सकता.
 
त्रिजटा की प्रतिज्ञा: रावण ने सीता की रक्षा के लिए त्रिजटा नामक राक्षसी को नियुक्त किया था. त्रिजटा ने सीता को समझाया कि भगवान राम शीघ्र ही उन्हें रावण के चंगुल से छुड़ाने आएंगे. त्रिजटा के शब्दों से सीता को साहस और शक्ति मिली.

दशरथ को दिया वचन: राजा दशरथ ने सीता को उनकी शक्ति से अवगत कराने के बाद, उन्हें उस शक्ति का उचित उपयोग करना भी सिखाया. उन्होंने उससे कहा, "बेटी, कभी भूलकर भी अपने दुश्मन को उसी नजर से मत देखना जिस नजर से तुम उस घास को देखती थी." अपनी आँखों में हमेशा करुणा और प्रेम का सागर बनाए रखें. अपनी शक्ति केवल सुरक्षा और कल्याण के लिए रखें, विनाश के लिए नहीं.

इन सभी कारणों के सम्मिलित प्रभाव के कारण ही माता सीता ने अपनी शक्तियों से रावण को जलाकर भस्म नहीं किया. उन्होंने धैर्य, आदर और धर्म के पालन के साथ भगवान राम की प्रतीक्षा की और अंततः धर्म की स्थापना हुई.

Disclaimer: हमारा लेख केवल जानकारी प्रदान करने के लिए है. ये जानकारी सामान्य रीतियों और मान्यताओं पर आधारित है.) 

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Sita could burn Ravana to ashes herself, then why did she keep waiting for Ram? intresting facts of Ramayana katha
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सीता रावण को स्वयं जलाकर भस्म कर सकती थीं, तो फिर वे राम का इंतजार क्यों कीं?
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रावण को सीता जी ने क्यों नहीं मारा?

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सीता रावण को स्वयं जलाकर भस्म कर सकती थीं, तो फिर वे राम का इंतजार क्यों करती रहीं?

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