डीएनए हिंदीः भगवान शालिग्राम और देवी तुलसी की पूजा हमेशा साथ में करनी चाहिए. देव उठनी एकादशी के दिन ही शालिग्राम और तुलसी का विवाह हुआ था, हालांकि इस बार तुलसी विवाह 5 नवंबर को होगी.
देवउठनी एकादशी पर तुलसी के पौधे का विवाह शालिग्राम शिला से करवाया जाता है. शालिग्राम भगवान विष्णु के ही रूप हैं देवी तुलसी मां लक्ष्मी का रूप हैं. आज देवउठनी एकादशी पर भगवान शालिग्राम शिला की पूजा जरूर करनी चाहिए. लेकिन उससे पहले यह जान लें कि ये शिला कहां असली मिलती है और शालिग्राम की पूजा करने के क्या-क्या पुण्य लाभ मिलते हैं.
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कहां मिलती है शालिग्राम शिला
शालिग्राम शिला असली नेपाल की गंडकी नदी में पाई जाती है. इस शिला पर कीड़ों के काटे हुए निशान होते हैं. खास बात ये है कि ये निशान सुदर्शन चक्र की तरह नजर आते हैं. बता दें कि शालिग्राम शिला की प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती, इन्हें सीधे मंदिर में स्थापित किया जाता है.
तुलसी-शालिग्राम विवाह से मिलता है कन्या दान का पुण्य
भगवान् शालिग्राम की पूजा कभी भी देवी तुलसी के बिना पूरी नहीं मानी जाती है है. इसलिए हमेशा दोनों जनों की पूजा साथ करें. मान्यता है कि तुलसी और शालिग्राम की पूजा से विवाह से जुड़े हर कष्ट दूर हो जाते हैं. साथ ही कलह, दुख और पाप के साथ किसी भी तरह अभाव दूर होता है. मान्यता है कि शालिग्राम और तुलसी का विवाह करना कन्यादान जैसा पुण्य दिलाता है.
शालिग्राम की पूजा से दूर होते हैं हर दोष
जिस घर में शालिग्राम शिला की पूजा होती है वहंा हर तरह के दोष मुक्त हो जाते हैं. पितृ दोष, ग्रह दोष, वास्तु दोष आदि सबसे मुक्ति मिलती है. वहीं देवी लक्ष्मी भी ऐसे घर में रहती हैं और हर तरह की नकारात्मकता दूर होती है. मान्यता है कि जिस घर में भगवान शालिग्राम होए वह घर तीर्थ के समान हो जाता है.
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रोज करें भगवान शालिग्राम की पूजा
घर में स्थापित भगवान शालिग्राम की पूजा रोज करनी चाहिए. इस पर चंदन से श्रृंगार जरूर करना चाहिए और शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए. जो व्यक्ति शालिग्राम पर रोज जल चढ़ाता हैए वह अक्षय पुण्य प्राप्त करता है. शालिग्राम को अर्पित किया हुआ पंचामृत प्रसाद के रूप में सेवन करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. डीएनए हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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Bhagwan Shaligram devi Tulsi Puja Labh
शालिग्राम की पूजा से ग्रह से लेकर पितृदोष तक सब होता है दूर, यहां मिलती है असली शिला