Supreme Court on Freedom of Speech: कॉमेडियन कुणाल कामरा (Kunal Kamra) की तरफ से महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) पर 'गद्दार' वाले चुटकुले ने हंगामा मचाया हुआ है. इस मामले में कुणाल कामरा पर कई FIR दर्ज हुई हैं, जिसके बाद विपक्षी दलों ने अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) का मुद्दा उठाया है. हालांकि महाराष्ट्र में सत्ताधारी भाजपा (BJP), शिवसेना (Shiv Sena) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के गठबंधन ने इस मुद्दे को नकार दिया है. इस विवाद के बीच शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने 'बोलने की स्वतंत्रता' को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बोलने की आजादी के बिना सम्मानजनक जिंदगी जीना असंभव है. सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी (Imran Pratapgarhi) के खिलाफ गुजरात पुलिस (Gujarat Police) की तरफ से दर्ज FIR खारिज करते समय की. गुजरात पुलिस ने इमरान के सोशल मीडिया पर एक कविता 'ऐ खून के प्यासे बात सुनो...' पोस्ट करने के लिए उनके खिलाफ यह मुकदमा दर्ज किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर अपने फैसले में क्या-क्या कहा है, चलिए 5 पॉइंट्स में बताते हैं-
1- बोलने की आजादी के बिना सम्मानित जीवन असंभव
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस. ओका (Justice Abhay S Oka) और जस्टिस उज्जल भुयान (Justice Ujjal Bhuyan) की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाया है. गुजरात पुलिस की FIR को खारिज करते समय बेंच ने कहा,'किसी शख्स या समूह को अपने विचार पेश करने की आजादी होना किसी भी स्वस्थ, सभ्य समाज का अखंड हिस्सा है. अपने विचार या राय व्यक्त करने की आजादी के बिना सम्मानित जीवन जीना असंभव है, जिसकी संविधान के अनुच्छेद 21 में गारंटी दी गई है. कविता, साहित्य, नाटक, फिल्में, स्टेज शो, हास्य व्यंग्य या कला किसी भी इंसान की जिंदगी को अर्थपूर्ण बनाते हैं.
2- विचार का मुकाबला विचार से कीजिए
सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा,'स्वस्थ लोकतंत्र में किसी शख्स या समूह की तरफ से जताए गए विचार, राय या सोच का मुकाबला उसके विपरीत विचार, राय या सोच पेश करके करना चाहिए. यदि किसी व्यक्ति के विचारों को बड़ी संख्या में लोग नापंसद करे तो भी यह उस शख्स का अधिकार है कि उसके विचारों का सम्मान और संरक्षण होना चाहिए.
3- कब लागू की जा सकती है BNS की धारा 196
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196 कब लागू की जा सकती है. धारा 196 के प्रावधान ऐसे काम या भाषण के मामले में दंड तय करता है, जिनसे लोगों के बीच घृणा, दुश्मनी या विभाजन को बढ़ावा मिलता है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) की नागपुर बेंच के एक फैसले का अनुसरण किया, जिसमें कहा गया था,'जब BNS की धारा 196 के दंडनीय अपराध का आरोप लगाए जाने पर बोले गए या लिखे गए शब्दों का प्रभाव मजबूत दिमाग वाले दृढ़ व साहसी लोगों के आधार पर करना होगा ना कि कमजोर और अस्थिर दिमाग वाले लोगों के मानकों के आधार पर. इस प्रभाव का आकलन हमेशा असुरक्षित रहने वाले या आलोचना को अपनी सत्ता के लिए खतरा मानने वाले लोगों के आधार पर नहीं किया जा सकता है.' जस्टिस भुयान ने यह भी कहा कि आज के फैसले से यह स्पष्ट होता है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर लगे प्रतिबंध उचित होने चाहिए. ये काल्पनिक और दमनकारी नहीं हो सकते हैं.
4- कोर्ट को करना चाहिए बोलने की स्वतंत्रता का संरक्षण
जस्टिस ओका ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यह कोर्ट की ड्यूटी है कि वह भारतीय संविधान के तहत गारंटी के तौर पर दिए अधिकारों को बहाल करे और उन्हें लागू कराए. उन्होंने साथ ही कहा कि भले ह जजों को खुद बोले गए या लिखे गए शब्द पसंद नहीं हों, लेकिन मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करना उनकी ड्यूटी है. उन्होंने कहा,'संविदान को बनाए रखना हम जजों का भी दायित्व है. जब पुलिस या कार्यपालिका अभिव्यक्ति की आजादी को लागू करने में फेल हो जाएं तो उसमें दखल देना कोर्ट की ड्यूटी है.' उन्होंने कहा,'कोई अन्य इंस्टीट्यूशन नहीं है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बरकरार रख सकता है. अदालतों को खासकर सांविधानिक अदालतों को नागरिकों के अधिकार की सुरक्षा के लिए अग्रिम मोर्चे पर होना चाहिए. यह अदालतों को बाध्य करने वाला कर्तव्य है कि वे सुनिश्चित करें संविधान और उसके आदर्श कुचलने ना जाएं. अदालतों का प्रयास हमेशा मौलिक अधिकारों की रक्षा और संवर्धन करना होना चाहिए, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी शामिल है, जो उदार संवैधानिक लोकतंत्र में नागरिकों के सबसे प्रिय अधिकारों में से एक है.'
5- पुलिस को संविधान का पालन करना चाहिए
बेंच ने इस बात पर भी जोर दिया कि पुलिस अफसरों को संविधान का पालन करना चाहिए, क्योंकि लोगों के अधिकार बहाल करना उनकी ड्यूटी है. संविधान का दर्शन और आदर्श उसकी प्रस्तावना में ही निहित हैं. बेंच ने कहा,'प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत के लोगों ने भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने और उसके सभी नागरिकों को विचार की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का गंभीरतापूर्वक संकल्प लिया है. इसलिए विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे संविधान के आदर्शों में से एक है.'
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'अभिव्यक्ति की आजादी ठीक, लेकिन...' सुप्रीम कोर्ट ने Kunal Kamra विवाद के बीच कही बड़ी बात, पढ़ें 5 पॉइंट्स