वेलेंटाइन डे (Valentine's Day) केवल आधुनिक प्रेम कहानियों का उत्सव नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक प्रेम कथाओं को याद करने का भी दिन है, जिन्होंने समाज पर अमिट छाप छोड़ी. झारखंड के संथाल आदिवासी समाज की भाषा संथाली को एक अलग पहचान देने वाली ओलचिकी लिपि की कहानी भी एक अमर प्रेम कथा से जुड़ी है. यह लिपि सिर्फ भाषा का माध्यम नहीं, बल्कि बिदू और चांदान की अटूट प्रेम कहानी की विरासत भी है. समाज ने उनके प्रेम को अस्वीकार कर दिया, लेकिन उनका प्रेम न केवल अमर हुआ, बल्कि संताल समाज को उसकी पहली मूल लिपि भी दे गया. आज भी संताल समाज माघ पूर्णिमा के दिन बिदू-चांदान को विद्या के देवी-देवता के रूप में पूजता है.
समाज ने नहीं स्वीकारा
झारखंड के बाहागढ़ के जंगलों में जन्मे बिदू और चायगढ़ के मांझी बाबा के घर जन्मी चांदान की कहानी किसी लोककथा से कम नहीं है. एक दिन बिदू चायगढ़ में आयोजित सांस्कृतिक आयोजन में शामिल हुआ और वहीं उसकी मुलाकात चांदान से हुई. दोनों के बीच प्रेम हुआ, लेकिन समाज ने इसे स्वीकार नहीं किया. जिसके बाद चायगढ़ के लोगों ने बिदू को पीट दिया और उसे मारने की कोशिश की. हालांकि, किसी तरह वह भाग निकला और जंगल में छिप गया.
खास भाषा में होती थी बात
एनबीटी कि एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान बिदू ने एक अनूठी लिपि में संदेश लिखकर चांदान को बताया कि वह जीवित है और कहां छिपा है. यह लिपि सिर्फ चांदान ही समझ सकती थी, क्योंकि यह दोनों के बीच की गुप्त भाषा थी, जिसे उन्होंने खासतौर पर अपने बातचीत के लिए तैयार किया था. जब चांदान ने इन संकेतों को पढ़ा, तो उसने बिदू को ढूंढ लिया जिसके बाद दोनों का पुनर्मिलन हुआ.
पंडित रघुनाथ मुर्मू की अनमोल विरासत
इस प्रेम कथा से प्रेरित होकर पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओलचिकी लिपि को विकसित किया और इसे संथाल समाज की पहचान बना दिया. उन्होंने इसे शिक्षा और संचार का सशक्त माध्यम बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिनमें अल चेमेद, परसी पोहा, रोनोड़, ऐलखा हितल, बिदू-चांदान और खेरबाड़ वीर प्रमुख हैं. संथाल समाज में आज भी बिदू और चांदान को विद्या के देवी-देवता के रूप में पूजा जाता है और उनकी प्रेरणा से मिली ओलचिकी लिपि को गर्व से अपनाया जाता है.
माघ पूर्णिमा पर बिदू-चांदान की विशेष पूजा
झारखंड के सरायकेला जिले के राजनगर प्रखंड के जामजोड़ा बाहा डुंगरी में माघ पूर्णिमा के अवसर पर संताल समुदाय के लोग प्रतिवर्ष बिदू-चांदान की पूजा-अर्चना करते हैं. यह आयोजन तीन दिवसीय समारोह के रूप में मनाया जाता है, जिसमें सामूहिक पूजा, गोष्ठियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं. संताल समाज के लिए यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और विरासत का उत्सव है. यह पूजा न सिर्फ एक अमर प्रेम कथा की याद दिलाती है, बल्कि भाषा और पहचान की उस विरासत को भी सहेजने का प्रयास है, जिसे गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू ने स्थापित किया था.
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एक लव स्टोरी से मिली संथाली भाषा को लिपि, अमर हो गई बिदू और चांदान की प्रेम कहानी