मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद शासन संभालने वाले छत्रपति संभाजी महाराज ने मुगलों का विरोध जारी रखा और नौ साल के संघर्ष के बाद अपने प्राणों की आहुति दे दी. औरंगजेब के हाथों बंदी बनाए जाने और यातनाएं सहने के बाद भी वे आखिर तक अडिग रहे. मराठों का औरंगजेब के खिलाफ संघर्ष दशकों तक जारी रहा और राजाराम महाराज (छत्रपति संभाजी महाराज के सौतेले भाई और छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र) की 1700 में मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं हुआ. उनके निधन के बाद उनके पीछे शिवाजी द्वितीय और महारानी ताराबाई भोंसले ने भी साहस और बहादुरी का परिचय दिया और औरंगजेब की मृत्यु तक मुगलों को चकमा देने का कोई मौका नहीं छोड़ा.
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महारानी ताराबाई को पुर्तगालियों ने दी थी खास उपाधि
महारानी ताराबाई भोंसले ने 'स्वराज्य' के सपने को जीवित रखने में असाधारण योगदान दिया. उन्होंने मुगल अत्याचारों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और प्रतिरोध करना जारी रखा. महारानी ताराबाई अपनी इच्छा शक्ति के बल पर मेवाड़ की रानी पद्मावती और कर्णावती, वारंगल की रानी रुद्रम्मा देवी जैसी महान रानियों की श्रेणी में शामिल हो गईं जिन्होंने दिल्ली सल्तनत और सुल्तानों का जमकर विरोध किया. महारानी ताराबाई भोंसले की बहादुरी के कायल पुर्तगाली भी थे जिन्होंने महारानी को मुगल शासक औरंगजेब के खिलाफ उनकी बहादुरी के लिए 'रैन्हा दोस मराठा' (मराठों की रानी) की उपाधि दी.
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कौन थीं ताराबाई
इतिहासकार जे.एन. सरकार ने मुगलों पर लिखे अपने लेखों में लिखा है कि अगर ताराबाई मराठा साम्राज्य की रक्षा के लिए नहीं होतीं तो इतिहास शायद अलग दिशा में जाता. उनकी प्रशासनिक योग्यता और चरित्र की मजबूती ने देश को भीषण संकट से बचाया. ताराबाई का जन्म 1675 में भोंसले वंश में हुआ था और 8 साल की आयु में उनका विवाह राजाराम महाराज से हुआ था. राजाराम महाराज की मृत्यु के समय ताराबाई की आयु 25 वर्ष थी. इसी समय से वह अपने शिशु पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षक बन गईं. दुःख में डूबने के बजाय उन्होंने तुरंत एक संप्रभु मराठा राज्य और स्वराज्य की स्थापना के सपने को साकार करने की जिम्मेदारी ले ली.
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ताराबाई ने मुगल सेना की नाक में कर दिया था दम
ताराबाई घुड़सवार सेना चलाने में कुशल थीं. यह कौशल उन्होंने अपने पिता हंबीरराव मोहिते से सीखा था जो शिवाजी के अधीन सेनापति के रूप में कार्यरत थे. मुगलों के खिलाफ कई लड़ाइयों में उन्होंने मराठा सेना का नेतृत्व किया था. महल की दीवारों के पीछे से शासन करने के बजाय ताराबाई ने आगे से नेतृत्व किया. वह एक किले से दूसरे किले तक जाती थी और सैनिकों के समूहों का संचालन करती थीं. जब मराठों की कमान एक महिला के हाथ में होने की बात मुगल सेना तक पहुंची तो उन्होंने यह सोचकर उपहास किया कि जीत उनकी होगी. लेकिन जैसे-जैसे युद्ध शुरू हुआ उन्हें पता चला कि उन्होंने मराठा योद्धा रानी को बहुत कम आंका था.
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आखिरी समय तक राजनीति में सक्रिय रहीं ताराबाई
उनके शासनकाल में मराठा सेनाओं ने दक्षिणी कर्नाटक पर विजय प्राप्त की और बुरहानपुर, सूरत और भरूच सहित पश्चिमी तट के कई समृद्ध शहरों पर हमला किया. उनकी कमान के तहत मराठा सेना मुगल नियंत्रित क्षेत्रों में गहराई तक आगे बढ़ी और मालवा और गुजरात जैसे शहरों पर हमला किया. बूढ़ा और थका हुआ औरंगजेब मराठा विद्रोह को दबाने में बार-बार असफल रहा और 2 मार्च 1707 को उसकी मृत्यु हो गई. मराठा साम्राज्य के भीतर राजनीतिक बदलावों के कारण बाद के वर्षों में दरकिनार कर दिए जाने के बाद भी ताराबाई मराठा राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति बनी रहीं और अपनी वृद्धावस्था में भी राज्य के मामलों में सक्रिय रूप से शामिल रहीं. साल 1761 में ताराबाई का निधन हुआ.
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Aurangzeb and Tarabai Bonsale (Image: Wikimedia Commons)
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