मुफ्त की सुविधाएं कहें, रेवड़ियां कहें या फ्रीबीज... चुनाव जीतने के लिए हर राजनीतिक पार्टियां इन्हें कल्याणकारी योजना बताकर वोटरों को लुभाने की कोशिश करती हैं. फिर चाहे इसमें केंद्र हो या राज्य सरकारें. सत्ता की चाबी पाने के लिए अब हर दल ने 'रेवड़ी पथ' अपना लिया है. लेकिन अब केंद्र सरकार इस पर लगाम लगाने का प्लान बना रही है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोदी सरकार सेंट्रल टैक्स में राज्यों की हिस्सेदारी को कम करने पर विचार कर रही है.
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया कि केंद्र सरकार Central Tax में राज्यों की हिस्सेदारी को 1 से 2 प्रतिशत घटा सकती है. राज्यों की अभी सेंट्रल टैक्स में 41 फीसदी की हिस्सेदारी है. वित्त आयोग इसमें कटौती करके 40 फीसदी करने की सिफारिश कर सकता है. वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया 31 अक्टूबर, 2025 तक सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे. जिसे 2026-27 में लागू किया जा सकता है.
मोदी कैबिनेट मार्च तक इस प्रस्ताव को मंजूरी दे सकती है. जिसके बाद वित्त आयोग के पास भेजा जाएगा. केंद्र के इस कदम से राज्यों को लगभग 35,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है. क्योंकि जब से केंद्र में बीजेपी की सरकार आई है, राज्यों की टैक्स से भारी इनकम होती है. सभी राज्य अलग स्टेट टैक्स वसूलते हैं, साथ ही सेंट्रल टैक्स से भी उन्हें हिस्सेदारी मिलती है.
डबल हुई राज्यों की हिस्सेदारी
साल 1980 में सेंट्रल टैक्स में राज्यों का हिस्सा 20 फीसदी होता था, लेकिन आर्थिक सुस्ती और खर्च की वजह राज्यों की हिस्सेदारी 41 फीसदी तक पहुंच गई है. हालांकि, जुलाई 2017 में GST के लागू होने के बाद राज्यों के रेवेन्यू जुटाने की क्षमता सीमित हो गई है. कोरोना महामारी के बाद केंद्र सेस और सरचार्ज में भी बढ़ोतरी कर दी है. पहले यह सकल कर राजस्व (Gross Tax Revenue) 9 से 12 फीसदी हुआ करता था, जो बढ़कर 15 फीसदी तक पहुंच गया.
इकॉनमी में 60% राज्यों की हिस्सेदारी
रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में केंद्र का राजकोषीय घाटा GDP का 4.8 फीसदी रहने का अनुमान है. वहीं, देश की अर्थव्यवस्था की बात करें तो केंद्र के कुल खर्च में राज्यों की हिस्सेदारी 60 फीसदी है. हेल्थ, एजुकेशन और सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर राज्य सरकारें सबसे ज्यादा खर्च करती हैं.
सूत्रों की मानें तो केंद्रीय कर में कटौती के अलावा राज्यों को राज्य कर राजस्व (State Tax Revenue) में कमी की पूर्ति के लिए दिए जाने वाले केंद्रीय अनुदान पर भी कुछ शर्तें लगाई जा सकती हैं. जिससे उन शर्तों को पूरा करने के बाद ही राज्य सरकारें फ्री की कल्याणकारी योजनाएं देने के लिए पात्र होंगी. अगर ऐसा होता है तो सबसे ज्यादा झटका आम आदमी पार्टी और खुद बीजेपी को लगेगा. क्योंकि दोनों ही पार्टियां सबसे ज्यादा ऐसी योजनाएं चला रही हैं जिससे सरकार को सबसे ज्यादा बोझ पड़ता है. फिर चाहे फ्री बिजली, पानी, राशन हो या फिर महिलाओं को दिए जाने वाले हर महीने 2500 रुपये हों.
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सांकेतिक तस्वीर
राज्यों की मुफ्त रेवड़ियों पर लगाम लगाएगी केंद्र सरकार, PM मोदी के इस प्लान से बढ़ेगी AAP जैसी पार्टियों की मुश्किल!