Delhi Election Result 2025: दिल्ली में विधानसभा चुनावों का परिणाम सामने आ गया है. भाजपा ने 12 साल से सत्ता में मौजूद आम आदमी पार्टी (AAP) को बुरी तरह परास्त कर दिया है. इस चुनाव परिणाम ने कई सारे सवाल खड़े कर दिए हैं. देश की राजनीति की शक्ल बदलने का दावा करके क्रांतिकारी के तौर पर इसमें एंट्री करने वाले अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) खुद ही बदल गए. केजरीवाल भी घोटालों के आरोप की उसी राजनीति में घिर गए, जिसके खिलाफ उन्होंने दिल्ली के रामलीला मैदान से कांग्रेस को सत्ता से हटाने का बिगुल बजाया था. दिल्ली की सत्ता संभालने के बाद केजरीवाल और उनके साथियों ने जो काम किए, उसे आदर्श मॉडल बताकर वे देश में पार्टी का विस्तार करने में जुटे थे. पंजाब में सत्ता हासिल करने से लेकर गुजरात में मुख्य विपक्षी दल बनने और गोवा में अहम छाप छोड़ने तक का काम इसी मॉडल के बूते किया गया था. अब दिल्ली में हार के साथ ही यह मॉडल ध्वस्त हो गया है. केजरीवाल खुद कई चुनौतियों से घिरे हुए हैं, जिनमें दोबारा जेल जाने का खतरा भी शामिल है. ऐसे में केजरीवाल का और AAP का भविष्य क्या होगा? इस सवाल का जवाब सभी जानना चाह रहे हैं.
चलिए 5 पॉइंट्स में बात करते हैं केजरीवाल के सामने अब क्या चुनौतियां हैं और उनकी पार्टी की हार का क्या असर होने वाला है-
1- समर्थकों का विश्वास वापस लौटाने की चुनौती
अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने जब आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) का गठन किया था तो उन्होंने लोगों को अलग तरह की राजनीति देने का वादा किया था. इस वादे के कारण ही उनके साथ बड़े पैमाने पर समर्थक जुड़े थे. इसमें केजरीवाल को करप्शन विरोधी और स्वच्छ शासन देने वाले चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया था. इस 'ब्रांड केजरीवाल' को दिल्ली शराब नीति घोटाले में उनके और मनीष सिसोदिया के जेल जाने से बड़ा झटका पहुंचा है. दिल्ली चुनाव में पार्टी की हार ने यह साबित कर दिया है कि समर्थकों का विश्वास इस ब्रांड केजरीवाल से उठ गया है. अब केजरीवाल के सामने सबसे पहली चुनौती इस यकीन को वापस लौटाने की है.
2- पार्टी संगठन को दोबारा खड़ा करने की चुनौती
कांग्रेस छोड़कर आप में आए नेताओं को विधानसभा चुनावों में टिकट देने से पार्टी संगठन में बड़े पैमाने पर नाराजगी थी. इसके चलते दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर आप नेताओं ने पार्टी छोड़कर भाजपा या कांग्रेस का दामन थामा था. कई विधायकों ने भी टिकट कटने पर भाजपा का दरवाजा खटखटा दिया था. इसका असर चुनावों के दौरान बूथ पर वोटिंग में दिखाई दिया है. पार्टी के सत्ता से बाहर होने के बाद उसका दामन छोड़ने का सिलसिला और ज्यादा तेज हो सकता है. ऐसे में केजरीवाल के सामने फिर से दिल्ली में पार्टी संगठन को खड़ा करने की चुनौती होगी. इसका असर दूसरे राज्यों में भी दिखाई दे सकता है, जहां आप फिलहाल अपने पैर फैलाने की कोशिश में ही जुटी हुई है.
3- दिल्ली में चुनाव हारे, अब क्या करेंगे केजरीवाल?
केजरीवाल के सामने तीसरी सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अब आगे क्या करेंगे? भाजपा नेताओं ने उनके भगवंत मान को हटाकर पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की अफवाह फैलानी शुरू कर दी है, जिसका खंडन आप की तरफ से लगातार किया जा रहा है. हालांकि पंजाब की राजनीति से सीधा कोई नाता नहीं होने के चलते यह संभावना है कि केजरीवाल ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे. इसके बजाय केजरीवाल पंजाब के रास्ते राज्यसभा में एंट्री करने की राह चुन सकते हैं, जिससे वे केंद्रीय राजनीति में सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टक्कर ले पाएंगे. हालांकि इसमें बड़ा सवाल ये होगा कि इसके लिए वे राज्यसभा में अपने मौजूदा सांसदों में से किसकी बलि लेंगे? राज्यसभा में मौजूद आप सांसदों में संजय सिंह और अरविंद केजरीवाल की नजदीकियां जगजाहिर हैं. दिल्ली महिला आयोग की पूर्व चेयरपर्सन स्वाती मालीवाल के साथ फिलहाल केजरीवाल की खटपट है और दिल्ली सीएम आवास में मालीवाल पर हमले का आपराधिक मामला भी चल रहा है. इसके अलावा राघव चड्ढा भी केजरीवाल के बेहद करीबियों में शामिल होने के बावजूद हालिया समय में निष्क्रिय दिखाई दिए हैं. इनमें से किसकी जगह केजरीवाल केंद्रीय राजनीति में जाएंगे, ये देखने लायक होगा.
4- फिर से जेल जाने का खतरा भी मंडरा रहा ऊपर
अरविंद केजरीवाल के सिर पर दिल्ली शराब नीति घोटाले में फिर से जेल जाने का खतरा भी अब और ज्यादा तेजी से मंडराएगा. इस मामले में वे तिहाड़ जेल में रहने के बाद फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. भाजपा सत्ता संभालने के बाद इस मामले में निश्चित तौर पर ऐसे नए सबूत शराब नीति की फाइलों से निकालकर ED और CBI को देना चाहेगी, जो केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को फिर से जेल पहुंचाने के लिए पर्याप्त साबित हों.
5- अब I.N.D.I.A गठबंधन में कितनी मिलेगी तवज्जो?
अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के खिलाफ बने विपक्षी दलों के I.N.D.I.A गठबंधन में अहम चेहरा बनकर उभरे थे. उनकी अहमियत इतनी ज्यादा थी कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव की सपा, ममता बनर्जी की टीएमसी, शरद पवार की NCP (शरद), उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) समेत तमाम विपक्षी दलों ने कांग्रेस के बजाय उनका समर्थन किया था. अखिलेश यादव तो चुनाव प्रचार तक में पहुंचे थे. लेकिन अब हालात जुदा होंगे. केजरीवाल अपना सबसे मजबूत किला गंवा बैठे हैं. ऐसे में उन्हें विपक्षी गठबंधन में अपने लिए खास स्थान तलाशने में शायद ही आसानी होगी.
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