Three Language Formula controversy: बीते कुछ दिनों से केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीत त्रि-भाषा फार्मूला को लेकर बहस चल रही है. अब बहस में इन्फोसिस के पूर्व सीएफओ टीवी मोहनदास पई भी शामिल हो गए हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कई भाषाएं सीखना एक मूल्यवान कौशल है जो पूरे भारत में नौकरी के अवसरों को बढ़ाता है. पई ने तीन-भाषा सूत्र का समर्थन करते हुए कहा कि यह काम के लिए 'गतिशीलता' देता है और आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में एक बड़ा फायदा साबित हो सकता है. हालांकि, त्रि-भाषा फार्मूला को लेकर अब तक कई दिग्गज नेता, अभिनेता और व्यापारी अपनी राय रख चुके हैं. अभी भी कई लोगों के मन में त्रि-भाषा फार्मूल है क्या, क्या वाकई ये हिंदी को थोपता है और तमिलनाडु का हिंदी विरोध कितना पुराना है?, जैसे सवाल घूम रहे हैं. यहां जानें सभी सवालों के जवाब पॉइंट्स में.
त्रि-भाषा फार्मूला को लेकर ताजा विवाद
त्रि-भाषा फार्मूला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) का हिस्सा है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस नीति को लागू न करने पर केंद्र सरकार पर राज्य का बजट रोकने का आरोप लगाया है. तमिलनाडु ने केंद्र पर समग्र शिक्षा अभियान के तहत 573 करोड़ रुपये रोकने का आरोप लगाया है, क्योंकि राज्य ने मॉडल स्कूल स्थापित करने के लिए PM श्री पहल में शामिल होने से इनकार कर दिया है. तमिलनाडु में यह इनकार एनईपी को लागू करने की शर्त पर किया है.
थ्री लैंग्वेज फार्मूला को लेकर तमिलनाडु का विरोध तब और गहरा गया जब तमिलनाडु सरकार ने गुरुवार को 2025-26 के बजट के लिए अपने लोगो में देवनागरी रुपये के प्रतीक को तमिल अक्षर से बदल दिया. यह कदम राज्य का एनईपी के तहत तीन-भाषा फार्मूले के खिलाफ अपने अडिग रुख का संकेत देता है. तमिलनाडु का आरोप है कि केंद्र एनईपी के जरिए हिंदी को थोपने की कोशिश कर रहा है.
क्या सच में हिंदी थोप रहा त्रि-भाषा सूत्र?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में बहु-भाषावाद को बढ़ावा देती है. इसमें किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपने के बारे में नहीं कहा गया है. इसमें कहा गया है कि बच्चों द्वारा सीखी जानी वाली तीन भाषाएं राज्यों, क्षेत्रों और निश्चित तौर पर छात्रों की पसंद की होंगी. बशर्ते तीन में से दो भाषाएं भारतीय मूल की हों.
फिर तमिलनाडु क्यों कर रहा विरोध?
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि हिंदी के कारण उत्तर भारत में अवधी, बृज जैसी कई बोलियां लुप्त हो गईं. राजस्थान का उदाहरण देते हुए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा कि केंद्र सरकार वहां उर्दू हटाकर संस्कृत थोपने की कोशिश कर रही है. अन्य राज्यों में भी ऐसा होगा इसलिए तमिलनाडु इसका विरोध कर रहा है.
तमिलनाडु का हिंदी विरोध कितना पुराना?
तमिलनाडु में हिंदी का विरोध आज का नहीं बल्कि 1937 का है. जब सी राजगोपालाचारी की अध्यक्षता वाली तत्कालीन मद्रास सरकार ने स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य कर दिया था. जस्टिस पार्टी और पेरियार जैसे द्रविड़ नेताओं ने बड़े पैमाने पर इस फैसले का विरोध किया था. फिर 1940 में इस नीति को रद्द कर दिया, लेकिन हिंदी विरोध जारी रहा. वहीं, पेरियार ईवी रामासामी ने हिंदी विरोध को अपने द्रविड़ आंदोलन का एक प्रमुख हिस्सा बनाया.
1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पहली बार एक आधिकारिक दस्तावेज के रूप में त्रि-भाषा सूत्र को लाया गया. तभी तमिलनाडु ने इसका हिंदी थोपने का प्रयास कहकर विरोध किया था. वहीं, 1965 में जब हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा बनाया गया तब भी राज्य में सैंकड़ों मौतें हुईं और भारी विरोध देखने को मिला.
1968 में जब से हिंदी पर केंद्रित एनईपी शुरू की गई थी तब से तत्कालीन मुख्यमंत्री अन्नादुरई के नेतृत्व में तमिलनाडु ने दो-भाषा नीति को अपनाया है. तमिलनाडु में तमिल और अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती है.
क्या है त्रि-भाषा फार्मूला का इतिहास
त्रि-भाषा सूत्र कोई नया विषय नहीं है, बल्कि इसकी चर्चा आजादी के बाद विश्वविद्यालय शिक्षा संबंधी सुझावों के लिये गठित राधाकृष्णन आयोग (1948-49) की रिपोर्ट से ही शुरू हो गई थी. जिसमें तीन भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था का परामर्श दिया गया था. आयोग का कहना था कि माध्यमिक स्तर पर प्रादेशिक भाषा, हिंदी भाषा और अंग्रेजी भाषा की शिक्षा दी जाए.
इसके बाद साल 1955 में डॉ लक्ष्मण स्वामी मुदालियर के नेतृत्व में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन किया गया, जिसने प्रादेशिक भाषा के साथ हिंदी के अध्ययन का द्विभाषा सूत्र दिया और अंग्रेजी व किसी अन्य भाषा को वैकल्पिक भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा.
कोठारी आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 में 'त्रि-भाषा सूत्र' को स्वीकार कर लिया गया, लेकिन इसे धरातल पर नहीं लाया जा सका. वहीं, राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद NEP 1986 में त्रि-भाषा फार्मूला की पुन: पुष्टि की गई थी. त्रि-भाषा सूत्र की संकल्पना सबसे पहले 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत लाई गई थी. इसका उद्देश्य था कि भारत के सभी छात्र तीन भाषाओं में दक्षता प्राप्त करें:
- प्रथम भाषा – मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा
- द्वितीय भाषा – हिंदी या अंग्रेजी
- तृतीय भाषा – हिंदी भाषी राज्यों में कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा (जैसे तमिल, तेलुगु, बांग्ला) या विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच, जर्मन) और गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी
Learning more languages enable people to work across India. It is a very big skill and the 3 language formula has given us great mobility in work. It is a big competitive advantage https://t.co/MM5PdwSpBH
— Mohandas Pai (@TVMohandasPai) March 16, 2025
इसके बाद 1992 में एनईपी में संशोधन किया गया. नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने भाषायी विविधता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए इसमें संशोधन किया था. इस फॉर्मूले में तीन भाषाएं शामिल थीं- मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, आधिकारिक भाषा (अंग्रेजी सहित) और एक आधुनिक भारतीय या यूरोपीय भाषा. अब साल 2020 में भी इसी त्रि-भाषा सूत्र को अपनाया गया है. हालांकि, नई शिक्षा नीति के तहत किसी भाषा को थोपने की बात नहीं कही गई है. इस नीति को अधिक लचीला, समावेशी और राज्य पर अपनी भाषा चुनने का अधिकार दिया है.
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त्रि-भाषा सूत्र में ऐसा क्या कि लग रहे हिंदी थोपने के आरोप? तमिलनाडु का हिंदी-विरोध कितना पुराना?