उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन नेताओं की तैयारी अभी से शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले महिलाओं के लिए एक नायाब तोहफा देने की घोषणा की है और वह है 'स्त्री सम्मान-समृद्धि योजना.' नाम से ही योजना इतनी समृद्ध लग रही है कि हर महिला इसे सुनते ही आत्मनिर्भर महसूस करने लगी होगी!
क्या है 'स्त्री सम्मान-समृद्धि योजना'?
इस योजना के तहत महिलाओं के बैंक खातों में सीधे आर्थिक सहायता भेजी जाएगी. यानी वोट डालते ही खाते में रकम टपकने लगेगी! साथ ही, युवतियों को मोबाइल और प्रतिभावान छात्राओं को लैपटॉप भी दिया जाएगा, ताकि वे पढ़ाई करें या फिर सोशल मीडिया पर इन योजनाओं के गुण गाएं! अखिलेश यादव का दावा है कि यह योजना महिलाओं को सशक्त बनाएगी, लेकिन क्या वाकई सशक्तिकरण केवल 'फ्रीबीज' से संभव है?
'पैसा पॉलिटिक्स': महिला सशक्तिकरण या चुनावी मेकअप?
दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का ऑफर दिया, ममता बनर्जी ने 'लक्ष्मी भंडार' योजना में महिलाओं को मासिक भत्ता दिया, और अब अखिलेश यादव भी इसी 'वोट बैंक स्कीम' को यूपी में लागू करने का मन बना रहे हैं. क्या यह योजनाएं महिलाओं की असली समस्याओं को हल कर रही हैं, या बस चुनावी गणित की नई जोड़-घटाव तकनीक बन गई हैं?
पैसे से वोट खरीद सकते हैं?
या फिर पार्टियां पैसा फेंक तमाशा देख की राजनीति पर चल रही हैं. क्या पार्टियों यह समझती हैं कि पैसा देकर किसी को भी खरीदा जा सकता है फिर चाहें वह महिला वोट बैंक हो नेताओं के कालेधंधे, आपराधिक रिकॉर्ड को छुपाना. यह सच किसी से छुपा नहीं है कि कितने आपराधिक रिकॉर्ड्स वाले नेताओं को पार्टी में टिकट दिया जाता है और फिर वे मंत्रिमंडल में शामिल भी हो जाते हैं. इसका ताजा उदाहरण बिहार में नीतीश कुमार की कैबिनेट का विस्तार है. मंत्रिमंडल में भाजपा के 7 मंत्रियों को जोड़ा गया है. इन मंत्रियों में से कईयों पर आपराधिक रिकॉर्ड्स दर्ज हैं. बिहार की बात इसलिए क्योंकि यहां इस साल अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.
महिलाओं के लिए राजनीति में वाकई जगह या सिर्फ झुनझुना?
हर चुनाव में महिलाओं को लेकर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जब असल में उन्हें टिकट देने की बारी आती है, तो पार्टियां पुरुषों के नाम ही आगे कर देती हैं. आंकड़े खुद ही कहानी बयां करते हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में महिला मतदाता किसी भी पार्टी के लिए 'किंगमेकर' बनीं, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 14.4% ही रहा. 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 14.4% था. कुल 542 लोकसभा सीटों में से 78 सीटों पर महिलाओं ने जीत दर्ज की थी, जो अब तक की सबसे अधिक संख्या थी, लेकिन वैश्विक औसत (लगभग 25%) की तुलना में अभी भी काफी कम है. राज्य विधानसभाओं में यह संख्या 10-12% के बीच ही अटकी हुई है, भले ही महिला आरक्षण बिल का ढोल लंबे समय से पीटा जा रहा हो.
महिलाएं: बदलाव की वाहक या 'फ्री की राजनीति' का शिकार?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या महिलाएं सच में इन योजनाओं से सशक्त हो रही हैं या यह बस 'पैसा बरसाओ, वोट कमाओ' का खेल बन गई हैं? अगर हां, तो फिर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में सुधार क्यों नहीं दिखता? अगर नहीं, तो फिर पार्टियां क्यों बार-बार 'फ्री की स्कीम' लाकर वोट बैंक साधने की कोशिश कर रही हैं?
वोट बैंक का 'महिला संस्करण'?
यह बात साफ है कि महिलाओं को मुफ्त योजनाओं का लाभार्थी बनाकर असल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है. राजनीति में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी बढ़ाने की जगह उन्हें 'फ्री स्कीम' से संतुष्ट करने की कोशिश हो रही है. अगर वाकई महिलाओं का सशक्तिकरण चाहिए, तो शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर जोर दिया जाना चाहिए, न कि सिर्फ उनके बैंक खाते में कुछ रुपये डालकर वोट हथियाने की होड़ मचाई जानी चाहिए!
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नेताओं के लिए अंतिम टिप
महिलाएं किसी के पैसे की 'गुलाम' नहीं हैं. उनका अपना अस्तित्व है. वे मेहनत करके खुद का और अपने परिवार का पेट भर सकती हैं. ये सिर्फ महिलाओं को बदनाम करने की राजनीति है कि वे पैसे के लालच में आकर वोट देती हैं. हां, महिलाएं अहम हैं पर किसी का झुनझुना नहीं. महिलाएं मात्र 'मतदान तंत्र' का हिस्सा नहीं बल्कि गणतंत्र का हिस्सा होनी चाहिए!
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UP में 2027 की अभी से तैयारी, महिलाओं के लिए एक और पैसे वाली स्कीम, 'महिला मंथन' या सिर्फ 'मतदान मंत्र'?