दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों ने सबको चौंका दिया है. पिछले 3 विधानसभा चुनाव में दिल्लीवालों ने जिस आम आदमी पार्टी को सत्ता की कुर्सी पर बैठाया आज उसे उतार दिया है. इस दंगल में बीजेपी चैंपियन बनकर उभरी. उसका 27 साल बाद बनवास खत्म हो गया. वहीं, कांग्रेस एक बार फिर खाता खोलने में नाकाम रही. यह तीसरी बार है जब कांग्रेस शून्य पर सिमट कर रह गई. कांग्रेस इस बार खूब जोर-शोर से चुनावी मैदान में उतरी थी और उम्मीद जताई जा रही थी कि वह किंगमेकर की भूमिका निभाएगी, लेकिन उसके प्रदर्शन ने फिर मायूस किया.
कांग्रेस के स्टार प्रचारकों के तौर पर राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और प्रियंका गांधी मैदान में उतरे थे. उनके साथ कांग्रेस प्रत्याशी संदीप दीक्षित, अलका लांबा भी आक्रमक मुद्रा में नजर आए. कांग्रेस को उम्मीद थी कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच जो शीशमहल, शराब घोटाला, यमुना की सफाई और पानी में जहर जैसे मुद्दों पर बंदर बांट की लड़ाई चल रही है, उसका उसे फायदा मिल जाएगा. लेकिन यह सब बेकार साबित हुआ.
कांग्रेस का यह हाल देखकर ऐसा लग रहा है कि दिल्ली में उसका मर्सिया पढ़ने का समय आ गया है. हालांकि, इस बार उसकी वोट प्रतिशत ने इस बात के भी संकेत दे दिए हैं कि वह अभी जिंदा है. कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार 2 प्रतिशत अधिक वोट मिले. 2020 में कांग्रेस को 4.26 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जो इस बार बढ़कर 6.39 फीसदी हो गए. इससे पहले 2015 में कांग्रेस को 9.7 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन तीनों बार पार्टी खाता नहीं खोल सकी.
कांग्रेस का मानना है कि पार्टी को राज्यों में वापसी करने की जरूरत है, ताकि वह राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हो सके. लेकिन दिल्ली के नतीजों ने एक बार फिर उसके भविष्य पर सवाल उठा दिए हैं. कांग्रेस को यकीन ही नहीं हो रहा है कि नतीजे इस तरह से आएंगे.कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा कि इस तरह के नतीजे पार्टी में अनिश्चित्ता को दिखाता है. उन्होंने कई अहम मुद्दे उठाए थे, लेकिन जनता तक पहुंचाने में नाकाम रहे.
कुछ राजनीतिक एक्सपर्ट्स की मानना है कि आम आदमी पार्टी के सत्ता से बेदखल होने से आने वाले समय में कांग्रेस को फायदा मिल सकता है. क्योंकि जिस भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर अरविंद केजरीवाल 2013 में सत्ता आए थे और शीला दीक्षित को हटाया था. उस जाल में अब वो खुद ही फंस गए हैं. ईमानदारी, लोकपाल, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, राजनीतिक शुचिता की बात करने वाले केजरीवाल की छवि को बीजेपी यह साबित करने में कामयाब रही कि वह झूठे सपने दिखाते हैं.
2013 में कांग्रेस का वोटबैंक छिटकर जो आम आदमी पार्टी के पास चला गया था वह फिर से कांग्रेस के पास आ सकता है. दिवंगत मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने साल 1998 में बीजेपी को हराकर 47.8% वोट हासिल की थी. उसके बाद उसका वोट प्रतिशत लगातार बढ़ता गया. साल 2003 में 48.1% पहुंच गया था. हालांकि 2008 में 40.3% वोट ही मिल सके. लेकिन 2013 आम आदमी पार्टी के गठन के बाद उसका पतन शुरू हो गया. मुस्लिम हो या ओबीसी-दलित वोटर सब केजरीवाल के साथ जुड़ता चला गया.
2013 चुनाव में हालत ऐसी हो गई कि पार्टी महज 24.7 फीसदी वोट पर आ गई और शीला दीक्षित की बुरी हार हुई. उसके बाद 2015 में 9.7 प्रतिशत और 2020 में 4.26 प्रतिशत रह गए. लेकिन इस बार हुई 2 फीसदी वोट बढ़ोतरी को कांग्रेस संजीवनी तरह देख सकते है.
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तीसरी बार शून्य...क्या AAP की हार से कांग्रेस को मिलेगी संजीवनी या आ गया मर्सिया पढ़ने का समय?