साल था 2023 और महीना, अक्टूबर देश में सब कुछ लगभग नार्मल चल रहा था. लेकिन उसी बीच इंफ़ोसिस के को-फ़ाउंडर नारायण मूर्ति ने एक बेहद अजीब बात कह दी.  नारायण मूर्ति ने कहा था कि भारत की कार्यकुशलता दुनिया में सबसे कम है और चीन जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारतीय युवाओं को हफ़्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए. उन्होंने कहा था कि उन्होंने खुद इन्फ़ोसिस में 40 साल तक हर हफ़्ते 70 घंटे से ज़्यादा काम किया. नारायण मूर्ति का समर्थन करते हुए तमाम लोगों ने कहा कि जो नारायण मूर्ति कह रहे हैं वो बिलकुल सही है. ऐसे लोग 70 घंटों पर रुक जाते तो भी ठीक था.  बाद में तमाम बयान ऐसे भी आए जिसमें अलग अलग उद्यमियों ने 80 घंटे-90 घंटे काम करने पर बल दिया.

अभी कुछ दिन पहले ही नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने भी कुछ इसी तरह की बात की. और लोगों को हफ्ते में 90 घंटे काम करने की सलाह दी. अमिताभ कांत का सुझाव लोगों को नागवार गुजरा और तमाम लोगों की तरह उनकी बातों ने सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को भी आहत कर दिया. 

अखिलेश ने 90 घंटे के वर्क ऑवर पर तंज कसते हुए कहा है कि कहीं इंसान की जगह रोबोट की बात तो नहीं की जा रही है? बता दें कि अखिलेश के इस स्टेटमेंट ने समाज को दो वर्गों में विभाजित कर दिया है.

एक पक्ष पूरी तरह से अखिलेश के साथ है. जबकि दूसरा वर्ग वो है, जिसका मानना है कि चाहे वो अखिलेश यादव हों या फिर कोई और, वो तमाम लोग जो कम वर्किंग आर्स के पक्षधर हैं कहीं न कहीं युवाओं को आलसी बनाने का प्रयास कर रहे हैं.  

जिक्र अखिलेश की बातों का हुआ है. तो बता दें कि अखिलेश यादव ने अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पर एक लेटर पोस्ट किया है जिसमें वो युवा कर्मचारियों से संबोधित हुए हैं. अखिलेश ने लिखा है कि, जो लोग 90 घंटे काम करने की सलाह दे रहे हैं, कहीं वो इंसान की जगह रोबोट की बात तो नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इंसान जज्बात और परिवार के साथ जीना चाहता है.

उन्होंने कहा कि और आम जनता का सवाल ये भी है कि जब अर्थव्यवस्था की प्रगति का फायदा कुछ गिने चुने लोगों को ही मिलना है तो ऐसी 30 ट्रिलियन की इकोनॉमी हो जाए या 100 ट्रिलियन की, जनता को उससे क्या. सच्चा आर्थिक न्याय तो यही कहता है कि समृद्धि का लाभ सबको बराबर से मिले, लेकिन भाजपा सरकार में तो ये संभव ही नहीं है.

अखिलेश ने यह भी लिखा कि सलाह देने वाले भूल गये कि मनोरंजन और फिल्म उद्योग भी अरबों रुपये इकोनॉमी में जोड़ता है. ये लोग शायद नहीं जानते हैं कि एंटरटेनमेंट से लोग रिफेश्ड, रिवाइव्ड और री-एनर्जाइज्ड फील करते हैं, जिससे वर्किंग क्वॉलिटी बेटर होती है.

अखिलेश यादव ने कहा कि जिनकी नाव में छेद हो, उनकी तैरने की सलाह का कोई मतलब नहीं होता. उन्होंने कहा कि वर्क और लाइफ का संतुलन ही एक स्वस्थ और क्रिएटिव वातावरण तैयार करता है, जिससे युवा सच्चे मायने में देश और दुनिया को बेहतर बना सकते हैं.

बहरहाल अब जबकि वर्किंग आर्स की बहस में राजनीति और उसमें भी अखिलेश यादव आ गए हैं, तो जैसी उनकी बातें हैं भले ही एक पक्ष उनकी आलोचना कर रहा हो. लेकिन जब इन बातों का अवलोकन किया जाए तो कहीं न कहीं अखिलेश यादव द्वारा कही बातें इसलिए भी ठीक हैं क्योंकि व्यक्ति चाहे छोटा हो या बड़ा हर व्यक्ति की एक पर्सनल लाइफ है और बेहतर इंसान वही है जो अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में संतुलन बनाए. 

ध्यान रहे इंफ़ोसिस के को-फ़ाउंडर नारायण मूर्ति के अटपटे बयान के बाद तमाम मनोवैज्ञानिकों और मनोचिकित्सकों की कई रिसर्च भी सामने आई थीं जिनमें यही कहा गया था कि जो आदमी ज्यादा काम कर रहा है वो कहीं न कहीं इनफीरियॉरिटी  कॉम्प्लेक्स का शिकार है और उसका उद्देश्य ज़माने की नजरों में अपने को हीरो दर्शना है.

वहीं कुछ ऐसे भी शोध सामने आए थे जिनमें कहा गया था कि यदि व्यक्ति अतिरिक्त घंटों में काम कर रहा है तो यह संस्था के प्रति उसकी लॉयल्टी को दर्शाता है. खैर वर्किंग आर्स को लेकर कही तमाम बातें पर्सन टू पर्सन अलग होती हैं. रही लंबे समय तक काम करने की बात तो हम इतना ज़रूर कहेंगे कि व्यक्ति चाहे काम कम करे या ज्यादा लेकिन इस बात का ख्याल ज़रूर रखे कि उसकी नौकरी और उसकी जिंदगी में सामंजस्य जरूर बना रहे. 

हम ऐसा सिर्फ इसलिए कह रहे हैं क्योंकि यदि इंसान की पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में संतुलन होगा तो ही वह दिए गए टास्क को प्रभावी ढंग से कम समय में कर पाएगा.  

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Samajwadi Party Chief Akhilesh Yadav facing backlash on work life balance post on social media is useless and weird
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Long Working Hours पर बेवजह हो रही Akhilesh की आलोचना ...
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काई कारण हैं जो हमें ये बताते हैं कि वर्किंग आर्स पर जो अखिलेश ने कहा है वो पूर्णतः सही है
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Long Working Hours पर बेवजह हो रही Akhilesh की आलोचना, जो उन्होंने कहा, बिलकुल सही कहा!

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