एक ऐसे वक़्त में, जब हर दूसरी चीज के लिहाज से देश बंटा हो, वो क्रिकेट ही है, जो लोगों के साथ-साथ दिलों को जोड़ने की क्षमता रखता है. तो क्या वजह वाक़ई 'खेल' है या फिर इसका कारण कुछ और है? सवाल थोड़ा अटपटा लग सकता है. लेकिन जब हम इसका अवलोकन भारत के सन्दर्भ में करते हैं तो मिलता है कि भारत जैसे देश में खेल से ज्यादा इम्पॉर्टेंट खिलाड़ी हैं. कपिल ने कितना मारा? गावस्कर कितने पर गया? से लेकर ये मारा सचिन ने छक्का और राहुल द्रविड़ के दीवार बने रहने तक हिंदुस्तान में ऐसे मौके खूब आए हैं जब हमने आम लोगों को खिलाड़ियों पर मरते और उनके लिए किसी को मारते देखा है.
हमारे आस पास तमाम लोग ऐसे हैं जिनके लिए 'क्रिकेट' उसका फेवरेट खिलाड़ी है. यानी जब तक वो 'पसंदीदा' मैदान में है लोगों की निगाहें एक टक टीवी स्क्रीन पर हैं और जैसे ही वो आउट होकर पवेलियन लौटा लोग वापस अपनी रोजाना की ज़िन्दगी में चले जाते हैं. दौर आईपीएल का है इसलिए महेंद्र सिंह धोनी का जिक्र किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
एक हिंदी भाषी राज्य से आने वाले धोनी ने 2008 से 2023 तक उस चेन्नई की कप्तानी की है जिसने हमेशा ही हिंदी का विरोध किया. चेन्नई सुपर किंग्स पर एमएस धोनी का प्रभाव सिर्फ़ एक आईपीएल टीम विकसित करने से कहीं ज़्यादा रहा है, और उनका दृष्टिकोण सिर्फ़ क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करने से कहीं ज़्यादा समग्र है.
धोनी हमेशा से ही एक ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपनी लय के हिसाब से काम किया है, और जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनकी विरोधियों की कमज़ोरियों का आकलन करने की प्रवृत्ति और भी स्पष्ट होती गई.
चेन्नई की कप्तानी रही होगी धोनी के लिए एक टास्क
जैसा कि हमने ऊपर ही इस बात का जिक्र किया है कि धोनी चेन्नई के कप्तान रह चुके हैं. और चूंकि दक्षिण उसमें भी चेन्नई वो स्थान है जिसका उत्तर भारतीयों और हिंदी भाषियों के साथ क्या रवैया रहता ?है उसपर कुछ कहने और बताने की कोई जरूरत नहीं है. इसलिए जब 2008 में ये मौका धोनी को मिला होगा तो उस वक़्त उनके सामने कितनी चुनौतियां रही होंगी इसकी मात्र हम कल्पना ही कर सकते हैं.
अपनी परफॉरमेंस से की धोनी ने चेन्नई के हिंदी विरोधियों की बोलती बंद
अपने हेलीकाप्टर शॉट के लिए मशहूर महेंद्र सिंह धोनी का शुमार उन क्रिकेटर्स में है. जो जितनी शानदार पारी खेलते हैं उतनी ही बेहतरीन उनकी निर्णय लेने की क्षमता है. इस बात का फायदा चेन्नई के लिहाज से धोनी ने उठाया और ऐसी कई पारियां खेली जिन्होंने मुश्किल समय में चेन्नई की इज्जत रखी.
तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन में भी ऐसे तमाम लोग थे जिन्होंने मौके बेमौके इस बात का विरोध किया कि क्यों धोनी को कप्तानी सौंपी गई?
एक क्रिकेटर के रूप में कभी भी धोनी ने इस विषय को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. और हर बार अपनी बल्लेबाजी से ये बताया कि अगर तमिलनाडु ने उन्हें अपना कप्तान बनाया तो ये यूं ही नहीं था. धोनी उसके दावेदार थे.
अगले दो महीने हिंदीभाषी धोनी के इशारों पर चलेगा तमिलनाडु
भले ही तमिलनाडु में एम के स्टालिन हिंदी को एक बड़ा मुद्दा बनाकर उसके विरोध में हों. लेकिन जो तमिलनाडु के लिए हिंदी बेल्ट से आए हुए धोनी कर चुके हैं उसके बाद इस बात में कोई शक नहीं है कि वो अगले दो महीनों तक तमिलनाडु और तमिल अस्मिता के पुरोधाओं को अपने इशारों पर नचाने वाले हैं.
ध्यान रहे तमिलनाडु में धोनी की लोकप्रियता कमाल की है. वहां बच्चा बच्चा उनका फैन है. कहना गलत नहीं है कि धोनी द्वारा सिर्फ एक इशारा करने भर की देर है लोग अपना काम धंधा छोड़कर सड़कों पर आ जाएंगे.
बहरहाल तमिलनाडु के नेताओं का हिंदी का जितना भी विरोध करना हो वो करें. लेकिन जिस तरह अपनी बादशाहत धोनी ने तमिलनाडु में कायम की है संतोष इस बात का है कि वो हिंदी वाला ही था जिसने एक टीम के रूप में चेन्नई को वहां पहुंचाया जो उसकी सोच और कल्पना से परे था.
आज सारे देश की ही तरह तमिल लोग भी धोनी से प्रेम करते हैं. और स्वीकार सकते हैं इस बात को कि अगर चेन्नई को धोनी का साथ न मिला होता, तो चेन्नई सुपर किंग्स एक आम टीम की तरह रहती और उस मुकाम पर कभी न आती जहां उसे धोनी लेकर आए.
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