चाहे वो कांग्रेस और भाजपा हों, या फिर आम आदमी पार्टी. अब तक तीनों ही प्रमुख दल वोटर्स का मिजाज देखते हुए इस बात को समझ चुके हैं कि 2025 का दिल्ली विधानसभा चुनाव हर बार से अलग है. 10 साल से सत्ता में काबिज आम आदमी पार्टी के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई है. तो वहीं दो दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर भारतीय जनता पार्टी भी पुरजोर कोशिश कर रही है कि कैसे वो जनता के बीच अपनी पैठ स्थापित करे और सत्ता सुख भोगे.
जिक्र अगर कांग्रेस का हो तो जिस हिसाब से कांग्रेस ने उम्मीदवार उतारे हैं, माना यही जा रहा है कि जीते या हारे कांग्रेस दिल्ली का खेल जरूर प्रभावित करेगी. दिल्ली विधानसभा चुनावों को बीजेपी के लिहाज से इसलिए भी जरूरी माना है रहा है क्योंकि केंद्र में बीजेपी है.
यदि भाजपा दिल्ली जीत जाती है तो न केवल भविष्य में होने वाले चुनावों के मद्देनजर उसका मनोबल बढ़ेगा, बल्कि उसकी राहें सुगम होंगी. दिल्ली विधानसभा चुनावों के तहत जैसा प्रचार का दौर चला है और जैसे भारतीय जनता पार्टी ने एड़ी से लेकर चोटी का जोर लगाया है.
माना यही जा रहा है कि राजधानी दिल्ली में भी हरियाणा और महाराष्ट्र की पुनरावृत्ति हो सकती है. ध्यान रहे कि हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अपनी 10 में से पांच सीटें जीतने के बाद हरियाणा में पसंदीदा थी और पहलवानों, किसानों और अग्निवीर विरोध का राज्य केंद्र थी.
महाराष्ट्र में भी, महा विकास अघाड़ी ने 48 लोकसभा सीटों में से 30 सीटें जीतीं, भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति पीछे रह गई. हालांकि, हरियाणा में भाजपा ने तीसरी बार जीत दर्ज की. और महाराष्ट्र में, महायुति ने तीन-चौथाई बहुमत हासिल कर रिकॉर्ड स्थापित किया.
सवाल होगा कि आखिर ये सब संभव हुआ कैसे? तो इसका जवाब है माइक्रोमैनेजमेंट, छोटी नुक्कड़ सभाएं और सीट-दर-सीट के मुकाबलों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सहयोग और समाज के निचले तबके विशेषकर झुग्गी झोपड़ियों से गठजोड़.
झुग्गी झोपड़ियां कर सकती हैं पार्टियों के मुकद्दर का फैसला!
ज्ञात हो कि दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले मतदाता पिछले दो चुनावों से आप का समर्थन कर रहे हैं. ये मतदाता अधिकतर गरीब हैं और मुफ्त बिजली-पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, मोहल्ला क्लीनिक और अन्य योजनाओं के लाभार्थी हैं. आप का दावा है कि ऐसे लोग उसकी योजनाओं के कारण हर महीने 25,000 रुपये तक बचा रहे हैं.
बताते चलें कि दिल्ली में ऐसे 675 क्लस्टर हैं जहां झुग्गी झोपड़ियां हैं, और इनमें भी ज़्यादातर नई दिल्ली और दक्षिण दिल्ली लोकसभा सीटों के अंतर्गत आते हैं. इनकी सबसे कम संख्या उत्तर पूर्व और उत्तर पश्चिम दिल्ली लोकसभा सीटों में है.
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनवरी की शुरुआत में झुग्गी झोपड़ी क्लस्टर के निवासियों के लिए 1,675 फ्लैटों का उद्घाटन किया. भाजपा ने अलग-अलग झुग्गी-झोपड़ियों के लोगों को नए-नए स्वाभिमान अपार्टमेंट में ले जाकर इस बात पर ज़ोर दिया कि जिन लोगों के पास पक्के घर नहीं हैं, उन्हें जल्द ही ऐसे ही घर मिलेंगे.
आप ने जवाब दिया कि इस परियोजना को पूरा होने में 100 साल से ज़्यादा का समय लगेगा. झुग्गी झोपड़ी क्लस्टरों की संख्या और AAP के समर्थन आधार के बीच एक मजबूत संबंध है.
सबसे अधिक झुग्गी झोपड़ी क्लस्टरों वाली विधानसभा सीटों - नई दिल्ली, चांदनी चौक और दक्षिण दिल्ली - में AAP का वोट शेयर और भाजपा पर बढ़त 2020 में सबसे अधिक थी. लगभग 21 प्रतिशत झुग्गी झोपड़ीक्लस्टर दक्षिण दिल्ली में, 21 प्रतिशत नई दिल्ली में और 19 प्रतिशत चांदनी चौक में स्थित हैं, जहां AAP को क्रमशः 15 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 20 प्रतिशत की बढ़त मिली.
2022 में एमसीडी चुनाव में आप की जीत के साथ, भाजपा को उम्मीद है कि वह नागरिक मुद्दों के खिलाफ असंतोष को भुना सकती है क्योंकि कई झुग्गियों में अभी भी सफाई की कमी है और सीवेज की समस्या है.
एमसीडी चुनाव जीतने वाली पार्टी के विधानसभा चुनाव हारने का एक मजबूत चलन है. भाजपा के साथ भी ऐसा ही हुआ. इसने 2007, 2012 और 2017 के एमसीडी चुनाव जीते और 2008, 2013, 2015 और 2020 के लगातार विधानसभा चुनाव हार गई.
बहरहाल जिक्र तीनों ही प्रमुख पार्टियों और झुग्गी झोपड़ियों का हुआ है. तो पूर्व में हुए चुनावों का अवलोकन करते हुए ये बताना ज़रूरी है कि यहां दल वही कामयाब हुआ है जो इस वर्ग को रिझा पाया है. वहीं चुनावी जानकारों की मानें तो गृहमंत्री शाह और पीएम मोदी की जोड़ी ने इस वर्ग तक अपनी बातें पहुंचा दी हैं.
पीएम मोदी और अमित शाह दिल्ली के वोटर्स को प्रभावित करने में कामयाब हुए हैं या नहीं? इसका फैसला तो 8 फरवरी को हो जाएगा. लेकिन दिल्ली की चुनावी बिसात को देखकर ये कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि महिलाओं के बाद ये झुग्गी झोपड़ी वाले ही हैं जो कांग्रेस, भाजपा और आम पार्टी में से किसी एक को सत्ता की चाशनी में डूबी मलाई खाने का मौका देंगे.
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दिल्ली विधानसभा चुनावों में क्या है झुग्गी झोपड़ियों का गणित?