दिल्ली में सियासी पारा गर्म है. वजह है दिल्ली विधानसभा चुनाव. आरोप प्रत्यारोप तेज हैं. दिल्ली में 5 फरवरी को मतदान होगा और 8 फरवरी को वोटों की गिनती होगी. क्योंकि चुनावों में अब बस कुछ ही दिन  शेष हैं. दल चाहे वो भाजपा और कांग्रेस हों या फिर आम आदमी पार्टी और एआईएमआईएम इनके द्वारा प्रयास यही किया जा रहा कि कैसे भी करके जनता का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया जाए और सत्ता की चाशनी में डूबी मलाई का आनंद लिया जाए. दिल्ली चुनाव की इन सरगर्मियों के बीच यदि पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स की मानें तो दिल्ली में ऊंट किस करवट बैठेगा?  तीन चीजें महिलाएं, मुस्लिम और मिडिल क्लास इस बात का निर्धारण करेगा.

ध्यान रहे कि जैसा दिल्ली का महिला है, इन तीनों ही फैक्टर्स को किंगमेकर माना जा रहा है. इसलिए सभी पार्टियां उनका समर्थन पाने की पुरजोर कोशिश करती हुई नजर आ रही हैं. 

महिलाएं

हालिया कुछ चुनावों को देखें तो महिलाएं तमाम राज्यों के चुनावों में किंगमेकर के रूप में उभरी हैं. साक्षरता में सुधार के कारण, महिलाएं स्वतंत्र रूप से मतदान करने के फैसले ले रही हैं. कई राज्यों में वे पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में मतदान कर रही हैं. मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड में, कई महिलाओं ने नकद आय सहायता योजनाओं से प्रभावित होकर मौजूदा सरकारों को वोट दिया.

जिक्र दिल्ली का हुआ है तो बता दें कि 2015 के चुनावों में 53 प्रतिशत महिलाओं ने आप को वोट दिया था, 34 प्रतिशत ने भाजपा का समर्थन किया था और 10 प्रतिशत ने कांग्रेस का समर्थन किया था.आप को महिलाओं के बीच भाजपा के मुकाबले 19 प्रतिशत की बढ़त हासिल थी.

2020 के चुनावों में 60 प्रतिशत महिलाओं ने आप (+ सात प्रतिशत), 35 प्रतिशत ने भाजपा (+ एक प्रतिशत) और तीन प्रतिशत ने कांग्रेस (- सात प्रतिशत) का समर्थन किया. महिलाओं के बीच आप की भाजपा पर बढ़त बढ़कर 25 प्रतिशत (+ छह प्रतिशत) हो गई। जो 12 प्रतिशत के वोट शेयर में परिवर्तित होती है. 

बात यदि पुरुषों की हो तो 2020 में आप को 49 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया, जबकि 43 प्रतिशत ने भाजपा को वोट दिया, जबकि कांग्रेस पांच प्रतिशत पर सिमट गई। पुरुषों के बीच आप की भाजपा पर बढ़त सिर्फ़ छह प्रतिशत थी, जबकि महिलाओं के बीच यह 25 प्रतिशत थी. यह बढ़त लगभग तीन प्रतिशत के वोट शेयर में तब्दील होती है. इस प्रकार, आप को कुल 15 प्रतिशत वोटों में से 12 प्रतिशत वोट महिलाओं से तथा मात्र तीन प्रतिशत पुरुषों से प्राप्त हुए.

इसलिए, मुफ्त बिजली-पानी, सरकारी स्कूलों में शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार, मुफ्त बस यात्रा और मोहल्ला क्लीनिकों के माध्यम से बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण आप की जीत में महिलाएं बहुत बड़ी भूमिका निभा रही हैं.

महिलाओं का मतदान भी तेजी से बढ़ रहा है. 1993 में पुरुषों का मतदान 65 प्रतिशत और महिलाओं का मतदान 58 प्रतिशत था। 2020 में, पुरुषों का मतदान घटकर 63 प्रतिशत रह गया, जबकि महिलाओं का मतदान पुरुषों के बराबर रहा. तीन दशकों में, जबकि पुरुष मतदान में दो प्रतिशत की गिरावट आई है, मतदान में महिलाओं की भागीदारी में पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

आम आदमी पार्टी इस बात से वाकिफ है और इसीलिए उसने महिला सम्मान योजना शुरू की है, जिसके तहत महिलाओं को हर महीने 1,000 रुपये की नकद सहायता दी जाती है. अगर वह सत्ता में वापस आती है तो इसे बढ़ाकर 2,100 रुपये प्रति महीने कर दिया जाएगा.

हालांकि, पार्टी ने इस योजना को शुरू करने में देरी की है और एक भी पैसा नहीं दिया गया है. इसका क्रियान्वयन न होना पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है या इसके लाभ को सीमित कर सकता है क्योंकि पंजाब में भी ऐसी ही योजना लागू नहीं की गई है.

जिन राज्यों में मौजूदा सरकारें लाभान्वित हुई हैं, वहां ऐसी योजनाएं चुनाव से काफी पहले लागू की गई थीं. कांग्रेस ने महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये देने का वादा किया है, जबकि भाजपा से भी ऐसी ही मदद का वादा करने की उम्मीद है.

मुसलमान

2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 13 प्रतिशत है. कभी कांग्रेस के कट्टर समर्थक रहे मुस्लिम मतदाता पिछले कुछ सालों में आप के साथ जुड़ गए हैं. 2008 के विधानसभा चुनावों में 64 प्रतिशत मुसलमानों ने कांग्रेस, 14 प्रतिशत ने भाजपा और 22 प्रतिशत ने अन्य का समर्थन किया था.

2013 में, आप के पहले चुनाव में 53 प्रतिशत ने कांग्रेस का समर्थन किया था और 12-12 प्रतिशत ने आप और भाजपा का समर्थन किया था. 2015 में, एक बड़े बदलाव के रूप में लगभग 77 प्रतिशत ने आप को वोट दिया, जो 2020 में बढ़कर 83 प्रतिशत हो गया. कांग्रेस को केवल 13 प्रतिशत और भाजपा को तीन प्रतिशत वोट मिले.

2020 में AAP के 54 प्रतिशत वोट शेयर में से लगभग 11 प्रतिशत मुसलमानों से आए थे. AAP के हर पांच  मतदाताओं में से एक मुसलमान है. इसलिए AAP के लिए यह वोट ब्लॉक बनाए रखना बहुत ज़रूरी है.  वोट शेयर के मामले में AAP की भाजपा पर 15 प्रतिशत की कुल बढ़त में से 10 प्रतिशत मुसलमानों के खाते में हैं.

दिल्ली में 10 मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें हैं. 2020 में AAP ने नौ और भाजपा ने एक सीट जीती थी. AAP को इन सीटों पर औसतन 54 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 28 प्रतिशत (राज्य औसत से 11 प्रतिशत कम) और कांग्रेस को 16 प्रतिशत (राज्य औसत से 4 गुना) वोट मिले.

2013 में, कांग्रेस द्वारा जीती गई आठ सीटों में से पांच इन मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों से आई थीं, जिनका वोट शेयर 32 प्रतिशत था. कांग्रेस ने अब तक चार मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि आप ने 10 उम्मीदवार उतारे हैं. कांग्रेस इस वोट बैंक में सेंध लगाने की उम्मीद कर रही है.

2024 के लोकसभा चुनावों में, 34 प्रतिशत मुसलमानों ने कांग्रेस का समर्थन किया, हालांकि उस समय वह आप के साथ गठबंधन में थी. इमामों के बकाए का भुगतान न करना और हिंदू पुजारियों को वेतन देने का वादा करके आप द्वारा खेला गया सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड, कांग्रेस आप के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है.


यहां तक ​​कि 2022 के एमसीडी चुनावों में भी, सीलमपुर, शाहीन बाग और मुस्तफाबाद जैसे क्षेत्र, जो अतीत में आप के प्रमुख समर्थक रहे थे, शाहीन बाग में दिल्ली सरकार की निष्क्रियता और दंगों को रोकने में विफलता के कारण कांग्रेस के प्रति निष्ठा में उल्लेखनीय बदलाव देखा गया.

मिडिल क्लास 

दिल्ली की आबादी में मध्यम वर्ग का हिस्सा करीब 45 प्रतिशत है. क्योंकि यह एक शहरी केंद्र है और इसकी प्रति व्यक्ति आय 5.31 लाख रुपये है, जो भारत की तुलना में दोगुनी से भी ज़्यादा है. धार्मिक और जातिगत पहचान के अलावा सामाजिक-आर्थिक वर्ग भी दिल्ली के चुनावों में जटिलता की एक और परत जोड़ता है.

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक मध्यम वर्ग दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप का समर्थन करता रहा है. 2015 में आप को मध्यम वर्ग का 55 प्रतिशत और भाजपा को 35 प्रतिशत समर्थन मिला था, जो 20 प्रतिशत की बढ़त थी. 2020 में आप का समर्थन मामूली रूप से घटकर 53 प्रतिशत रह गया, जबकि भाजपा का समर्थन बढ़कर 39 प्रतिशत हो गया.'

इससे मध्यम वर्ग से आप की बढ़त घटकर 14 प्रतिशत रह गई, जो 2015 में 20 प्रतिशत थी. आप को कुल 15 प्रतिशत वोट शेयर की बढ़त मिली है, जिसमें से लगभग सात प्रतिशत मध्यम वर्ग से आता है.

दिल्ली में मतदान का पैटर्न काफी अलग-अलग है, जहां मतदाता लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बिल्कुल अलग-अलग तरीके से व्यवहार करते हैं. दिल्ली में करीब 30 प्रतिशत मतदाता स्विंग वोटर हैं, जो लोकसभा में भाजपा/कांग्रेस (15-15 प्रतिशत) और विधानसभा चुनावों में आप का समर्थन करते हैं.

भाजपा के 15 प्रतिशत मतदाता जो राज्य और राष्ट्रीय चुनावों के बीच आप और भगवा पार्टी के बीच स्विच करते हैं, उनमें से कई मध्यम वर्ग से संबंधित हो सकते हैं, क्योंकि वे ज्यादातर गैर-कोर मतदाता हैं, यानी वैचारिक रूप से जुड़े नहीं हैं.

भाजपा को उम्मीद है कि आप नेतृत्व के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों से आप की विश्वसनीयता और अरविंद केजरीवाल की कट्टर ईमानदार छवि को नुकसान पहुंचेगा और मध्यम वर्ग के अधिकांश मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने में मदद मिलेगी.

2024 के आम चुनावों में, लगभग 50 प्रतिशत मध्यम वर्ग के मतदाताओं ने भाजपा का समर्थन किया, 32 प्रतिशत ने आप का और 16 प्रतिशत ने कांग्रेस का समर्थन किया. अगर भाजपा को विधानसभा चुनावों में लोकसभा में मिले मध्यम वर्ग के समर्थन को बरकरार रखने में सफलता मिलती है, तो वह आप की कीमत पर अपने खाते में करीब पांच प्रतिशत वोट शेयर जोड़ सकती है.

इससे 10 प्रतिशत का बदलाव आएगा और आप की कुल बढ़त 15 प्रतिशत से घटकर सिर्फ पांच प्रतिशत रह जाएगी. (अगर भाजपा को पांच प्रतिशत वोट शेयर मिलता है, तो 2025 में उसका वोट शेयर बढ़कर 44 प्रतिशत हो सकता है, जबकि आप का वोट शेयर घटकर 49 प्रतिशत रह सकता है.

बहरहाल, दिल्ली का किला कौन जीतेगा? इस सवाल का जवाब वक़्त देगा. लेकिन जैसा दिल्ली का मिजाज है और जिस तरह अलग अलग दल जनता को लुभाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं, कहना गलत नहीं है कि यदि उन्होंने महिला, मुसलमान और मिडिल क्लास में से किसी एक को भी नजरअंदाज कर दिया तो फिर स्थिति कुछ और होगी. 

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BJP Congress or AAP These 3 key factors to decide the fate of the parties in  Delhi Elections 2025
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भाजपा-कांग्रेस या फिर आप? Delhi Elections में निर्णायक रहेंगे ये 3 फैक्टर्स!
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पोलिंग बूथ पर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करती हुई एक मुस्लिम महिला
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Delhi Elections 2025: भाजपा-कांग्रेस या फिर आप? दिल्ली में पार्टियों की किस्मत का फैसला करेंगे ये 3 फैक्टर्स!

 

 

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