बीते कुछ वक़्त से वन नेशन वन इलेक्शन राजनीतिक दलों की जुबान पर है. चाहे वो सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष हर किसी की इसपर अपनी विशेष थ्योरी है. सत्ताधारी दल भाजपा जहां देश को इसका फायदा बता रहे हैं. तो वहीं विपक्ष ने जैसा माहौल तैयार किया, बताया यही गया कि इससे देश को बड़ी क्षति होगी. एक राष्ट्र, एक चुनाव से देश को फायदा होता है या फिर नुकसान? इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी है. लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा ने देश को इसके सम्पूर्ण लाभ नहीं बताए हैं.

यदि भाजपा ने देश को इसके फायदों से अवगत कराया होता, तो वो ये जरूर बताती कि, इस से स्वतः 'पैरोल' मिल सकती है, और वह भी 5 साल में सिर्फ़ एक बार. अब आप खुद इस बात की कल्पना कीजिये कि एक राष्ट्र, एक पैरोल से सरकारी अधिकारियों को समय और कागजी कार्रवाई की बचत के मामले में क्या हासिल हो सकता है.

आप चाहें तो इस पूरे मसले में गुरमीत राम रहीम को बतौर उदाहरण ले सकते हैं. बलात्कार-हत्या के दोषी बाबा को 2020 से अब तक एक दर्जन बार पैरोल दिया गया है.  गुरमीत राम रहीम मामले में दिलचस्प ये भी है कि पैरोल उसे हर बार चुनाव के आस पास मिलती है. 

हो सकता है हमारा ये कहना आपको आहत कर जाए. लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सार्वभौमिक सत्य यही है कि, सिस्टन यहां दोहरा अपराधी है. चूंकि जिक्र डेरा प्रमुख का हुआ है. तो ज्ञात हो कि गुरमीत राम रहीम की 12वीं पैरोल 28 जनवरी को मिली और यह उस वक़्त हुआ, जब दिल्ली में विधानसभा के और हरियाणा में नगर निगम चुनाव होने वाले हैं. 

जिस हिसाब से गुरमीत राम रहीम को पैरोल मिली है ऐसा लगता है जैसे हर चुनाव में 20 साल की सजा पाने वाले इस अपराधी के लिए समय समाप्त हो जाता है. ध्यान रहे कि गुरमीत राम रहीम को पूर्व में  2 अक्टूबर को 20 दिनों के लिए खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला था. और यहां भी दिलचस्प यह है कि जब हरियाणा में विधानसभा चुनाव थे.

बताते चलें कि हरियाणा में भाजपा अपने दो कार्यकाल के चलते सत्ता विरोधी लहर से जूझ रही थी मगर बावजूद इसके उसने तीसरी बार सत्ता में वापसी की.

गौरतलब है कि भारत में जेल से पैरोल 'अधिकार' में शामिल नहीं है.  बल्कि यह अधिकारियों के विवेक पर निर्भर करता है. लेकिन ये बेहद शर्मनाक है कि अधिकारियों ने राम रहीम के मामले में विवेकपूर्ण होने की जरा भी कोशिश नहीं की है. 

गुरमीत राम रहीम और चुनावों के विषय में हम क्यों बात कर रहे हैं? इसके लिए भी हमारे पास पर्याप्त कारण हैं. सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में लाखों अनुयायी हैं. हरियाणा में गुरमीत के डेरे के बारे में कहा जाता है कि वह 24 सीटों पर वोटों को प्रभावित कर सकता है. 

गुरमीत राम रहीम अकेले नहीं हैं. हमने उनका उदाहरण सिर्फ इसलिए दिया क्योंकि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में उनके कच्चे चिट्ठे का हिसाब रखना सुगम है. हालांकि उनका आशीर्वाद भाजपा के साथ है, लेकिन कई अन्य 'पहुंचे' हुए लोग भी होंगे, जो अन्य दलों को आशीर्वाद देते होंगे. क्या यह एकमात्र कारण नहीं होना चाहिए कि सभी पार्टियों को एक राष्ट्र, एक चुनाव का समर्थन करना चाहिए? क्या पता कुछ चुनिंदा लोगों को पैरोल हासिल करने का अवसर ही मिल जाए?

एक राष्ट्र, एक पैरोल या एक चुनाव, एक पैरोल, इसे आप जो भी कहें, इससे राजनीतिक दलों के समन्वय समय और जेल अधिकारियों के कागजी काम से लेकर अखबारों के प्रिंट तक, कई मोर्चों पर मेहनत और जटिलता की बचत होगी.  

जैसे चुनाव आयोग द्वारा चुनावों की घोषणा के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है, वैसे ही ये कहना भी गलत न होगा कि इससे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अपराधी स्वतः ही जेलों से बाहर आ जाएंगे. 

वे पूरे चुनाव प्रचार अवधि के दौरान बाहर रहेंगे और जैसे ही चुनाव ख़त्म होंगे, वापस जेल में चले जाएंगे.  इस पूरे मामले पर ये कहना हमारे लिए अतिश्योक्ति नहीं है कि यह घड़ी की सुई की तरह काम करेगा. बस जरूरत है कि राजनीतिक दल एक राष्ट्र, एक चुनाव के मुद्दे पर एक साथ आएं और सरकार को एक प्रक्रिया लागू करने में मदद करें.

इससे बचे हुए लोगों और पीड़ितों के परिवारों के मन से भी अनिश्चितता दूर हो जाएगी.   फिर उन्हें पांच साल में एक बार चुनाव की चिंता होगी जब अपराधी बाहर होंगे. एक ही चुनाव चक्र दोषियों के लिए भी उचित होगा. उन्हें पैरोल के लिए चुनाव कैलेंडर पर नज़र गड़ाए रखने की ज़रूरत नहीं होगी.

वन इलेक्शन, वन पैरोल, वन नेशन, एक राष्ट्र, एक चुनाव के कई लाभों में से एक है. यह समझ से परे है कि सरकार, जिसने संचार के सभी माध्यमों को हमेशा ही प्राथमिकता दी है, इस पर प्रकाश डालने से कैसे चूक गई?

राजनीतिक दलों के लिए अपराधियों को चुनावी प्रक्रिया से दूर रखना मुश्किल हो सकता है, लेकिन वे उन्हें किश्तों में रिहा होने से रोककर जेलों के दायरे में रखने में मदद कर सकते हैं. ईएमआई किसे पसंद है? और इसके लिए एक चुनाव, एक पैरोल की अवधारणा का उपयोग करने से बेहतर अवसर और क्या हो सकता है? 

खैर, होने को तो डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम और उसकी पैरोल को लेकर सवाल कई हैं. लेकिन फिर हमें ये भी याद रखना चाहिए कि जब सैयां कोतवाल हों तो फिर कुछ सवाल यदि सवाल रहें तो ही बेहतर हैं.  कम से कम आबरू ही रचेगी देश की, संविधान की, चुनाव की, चुनाव आयोग और न्यायपालिका की. 

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Before Delhi Elections 2025 how Dera Chief Gurmeet Ram Rahim is Brand Ambassador of One Nation One Election
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पैरोल के बाद कैसे वन नेशन, वन इलेक्शन के ब्रांड एम्बेसडर हैं गुरमीत राम रहीम?
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दिल्ली चुनाव से पहले गुरमीत राम रहीम को मिली पैरोल अपने में कई सवाल खड़े करती है
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पैरोल के बाद कैसे वन नेशन, वन इलेक्शन के ब्रांड एम्बेसडर की तरह हैं डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम?

 

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