Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की पहचान पूरी दुनिया में 'नवाबों के शहर (City of Nawabs) के तौर पर है, लेकिन अब ये 'भिखारियों का शहर' बनता जा रहा है. प्रदेश की राजनीति के इस सेंटर पॉइंट में आसपास के जिलों से आकर भीख मांगने वाले लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. डिस्ट्रिक्ट अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (DUDA), डीपीओ और एक निजी संस्था की तरफ से दो महीने पहले मिलकर किए गए सर्वे के आंकड़े अब सामने आए हैं. इस सर्वे के हिसाब से लखनऊ में करीब 10,000 भिखारी एक्टिव हैं, जो रात-दिन शहर के अलग-अलग हिस्सों में भीख मांगने का काम कर रहे हैं. इन लोगों ने बाकायदा यहां अपनी झुग्गी बस्तियां बसा ली हैं. इन भिखारियों में पुरुषों के अलावा महिलाएं और छोटे बच्चे भी बड़े पैमाने पर शामिल हैं.
सात जिलों से आ रहे हैं लखनऊ में भिखारी
सर्वे में सामने आया है कि लखनऊ के आसपास के 7 जिलों के भिखारी यहां आकर चौराहों और बाजारों में भीख मांगने का धंधा कर रहे हैं. डीपीओ विकास सिंह के मुताबिक, सर्वे के आंकड़े सामने आ गए हैं. इन आंकड़ों के हिसाब से बहराइच, लखीमपुर खीरी, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव, रायबरेली और खुद लखनऊ देहात के भिखारी यहां भीख मांग रहे हैं. ये भिखारी खुद तो भीख मांग ही रहे हैं. अपने बच्चों को भी सरकारी योजनाओं का लाभ उठाकर सुधारने के बजाय उन्हें भी भीख मांगने के धंधे में उतार रहे हैं.
10 हजार भिखारियों में सबसे ज्यादा बहराइच के
सर्वे में सामने आए आंकड़ों के हिसाब से लखनऊ में करीब 10 हजार भिखारियों की पहचान की गई है. इनमें सबसे ज्यादा भिखारी बहराइच जिले के हैं. सर्वे में चिह्नित भिखारियों में करीब 50 फीसदी भिखारी बहराइच के सामने आए हैं. डीपीओ सिंह के मुताबिक, सर्वे में 5312 भिखारी मिले, जबकि सर्वे शुरू करने से पहेल 3916 भिखारियों का मोबलाइजेशन कराया गया था. इस तरह कुल 9228 भिखारी चिह्नित हुए हैं. इनमें 50 फीसदी बहराइच के, जबकि दूसरे नंबर पर 1500 भिखारी लखीमपुर खीरी के पहचाने गए हैं. इन सभी ने लखनऊ में अपनी झोपड़ियां बना ली हैं. लखनऊ के दो गांवों नगराम और भजा खेड़ा के 200 भिखारी चिह्नित हुए हैं. लखनऊ में बाकी किसी गांव का कोई भिखारी नहीं मिला है.
बच्चों के स्कूल से निकालकर मंगवा रहे भीख
लखनऊ में भिखारियों के बच्चों को इस धंधे से दूर करने के लिए जिला प्रशासन ने कवायद चलाई थी. बाल सेवा योजना के तहत भिखारियों के 256 बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूल में कराया गया था. उनके खातों में हर महीने एक निश्चित धनराशि भी भेजी जा रही है लेकिन हिन्दुस्तान अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ये बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं, बल्कि उनके मां-बाप अब भी उनसे भीख मंगवा रहे हैं. राजधानी में भिखारियों को खत्म करने के लिए तीन साल में 200 से ज्यादा बैठक हो चुकी हैं, लेकिन समस्या वहीं की वहीं बनी हुई है.
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लखनऊ में भीख मांगने के लिए बैठे भिखारी. (AI Image)
नवाबों का नहीं भिखारियों का लखनऊ कहिए जनाब, सामने आया है ऐसा सच, जो उड़ा देगा होश