रमजान का महीना हो तो बिहार की सियासत में चहल-पहल बढ़ ही जाती है. चुनावी साल हो तो कई बार इफ्तार पार्टियों से ही लोग आने वाले नतीजों का भी अंदाजा लगा लेते हैं. इस बार भी माहौल ऐसा ही है. साल के अंत में विधानसभा के चुनाव होने हैं और इफ्तार पार्टियों में मुहब्बत का शर्बत पीने के लिए आ रहे लोगों पर सबकी नजर है. सबसे पहले नीतीश कुमार की इफ्तार पार्टी का कुछ मुस्लिम संगठनों ने बायकॉट किया तो यह सुर्खी बनी. इससे बड़ी खबर लालू यादव की इफ्तार पार्टी से कांग्रेस नेताओं की दूरी बनी. कयास लगने लगे कि क्या कांग्रेस अपने सबसे पुरानी सहयोगी से अलग होने का फैसला कर चुकी है. हालांकि, अगले ही दिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी इंडिया गठबंधन की सहयोगी पार्टियों के साथ बिहार चुनाव में उतरेगी. इससे राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की चिंता जरूर कम हुई होगी, लेकिन सीएम फेस को लेकर कांग्रेस ने जो कहा, उससे यह जरूर स्पष्ट हो गया कि चुनाव आने तक गंगा नदी में बहुत पानी बह चुका होगा. 

सीएम फेस पर अटकाया मामला 

खरगे के बाद बिहार कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने स्पष्ट कहा कि सीएम फेस को लेकर फैसला बाद में किया जाएगा. बिहार में महागठबंधन में राजद के तेजस्वी यादव को सीएम फेस माना जाता है. वे इसका दावा भी करते हैं. लालू खुद कह चुके हैं कि वे तेजस्वी को सीएम देखना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस ने इसमें अड़ंगा लगा दिया है. कांग्रेस का रुख चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि बिहार में उसके पास सीएम फेस लायक अपना नेता नहीं है. इसके बावजूद तेजस्वी यादव की अनदेखी कर कांग्रेस ने बता दिया है कि राजद उसे हल्के में लेने की गलती नहीं करे. 

कांग्रेस के मन में क्या

कांग्रेस की रणनीति साफ है. गठबंधन में रहकर वह अपने लिए सम्मानजनक सीटों की मांग करेगी. ऐसा नहीं हुआ तो वह दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकती है. यह विकल्प चुनाव में अकेले उतरने का हो सकता है. सीएम फेस पर कांग्रेस के रुख से लग रहा है पार्टी अंदरखाने इस वैकल्पिक रणनीति पर काम भी शुरू कर चुकी है.

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अचानक एक्टिव हुए कन्हैया कुमार

कन्हैया कुमार के नेतृत्व में पूरे बिहार में यात्रा निकालना इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है. इससे एक तो लुंज-पुंज पड़े कांग्रेस संगठन में कुछ चुस्ती आएगी. दूसरा कन्हैया कुमार के रूप में उसके पास ऐसा चेहरा होगा जिस पर वह दांव खेल सकती है. अब यह दांव कितना कारगर होगा, इसका अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है. कन्हैया कुमार बिहार से लेकर दिल्ली तक चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन कहीं जीत नहीं पाए हैं. जेएनयू से पढ़े-लिखे कन्हैया का भाषण सुनने भीड़ जमा होती है, लेकिन इनमें वोट देने वाले कम ही होते हैं. यानी कन्हैया अब तक क्राउड पुलर रहे हैं, वोट पुलर नहीं. उनके चेहरे को आगे कर कांग्रेस बिहार में कुछ बड़ा हासिल कर लेगी, इसकी संभावना कम है लेकिन पार्टी के पास राज्य में खोने के लिए कुछ नहीं है. 

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क्या करेंगे लालू?

फिर भी कांग्रेस का यह रवैया लालू के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है. अपने जीते जी वे तेजस्वी को मुख्यमंत्री बने देखना चाहते हैं. कांग्रेस के साथ गठबंधन इसमें मददगार हो सकता है, लेकिन इसके लिए लालू को अपनी पार्टी के हिस्से की कुछ सीटों की तिलांजलि देनी पड़ सकती है. पिछले चुनाव में कांग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसका विनिंग रेट बेहद कम था. इस बार कांग्रेस उससे ज्यादा सीटें मांग कर सकती है जिसे मानना राजद के लिए मुश्किल होगा. यदि किसी भी हालत में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ती है तो इसका नुकसान भी राजद को ही होगा. यानी आने वाले दिनों में लालू के लिए इधर कुआं, उधर खाई वाली हालत पैदा हो सकती है. इससे वो कैसे बाहर निकलते हैं, वह काफी हद तक बिहार चुनाव के नतीजे तय करेगा.

 

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congress to go with india alliance in bihar election but keeps mum on tejashwi yadav as cm face, tension for lalu yadav rjd
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खरगे ने लालू यादव को खुशखबरी तो दे दी, लेकिन... पिक्चर अभी बाकी है
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Bihar Politics: खरगे ने लालू यादव को खुशखबरी तो दे दी, लेकिन तेजस्वी का मामला उलझाकर बता दिया- पिक्चर अभी बाकी है

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कांग्रेस ने बिहार चुनाव में इंडिया गठबंधन के साथ उतरने का ऐलान कर लालू प्रसाद यादव को राहत दी, लेकिन सीएम फेस के मुद्दे पर उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
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खरगे ने लालू यादव को खुशखबरी तो दे दी, लेकिन... पिक्चर अभी बाकी है