Pravasi Bharatiya Divas: आज प्रवासी भारतीय दिवस है. आज के समय में भारतीय मूल के लोग दुनियाभर में मौजूद हैं. हर जगह अपनी कामयाबी का झंडा बुलंद कर रहे हैं. भारतीय लोगों के विदेश में बसने की शुरुआत अंग्रेजों में जमाने में ही हो गई थी. उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में ही अंग्रेज भारत से लोगों को बाहर लेकर जाने लगे थे, उन दिनों वो अपने दूसरे उपनिवेशों पर इन भारतीयों को मजदूरी के लिए ले जाते थे. विदेशों में भारी संख्या में वो भारतीयों को ले गए, इन भारतीय लोगों को कहा गया गिरमिटिया मजदूर. दरअसल अंग्रेज इन्हें एक एक खास एग्रीमेंट के तहत बाहर ले जा रहे थे. इनमें ज्यादातर यूपी और बिहार के लोग थे. ये एग्रीमेंट का उच्चारण नहीं कर पा रहे थे, इसे गिरमिट बोलते थे. इसलिए ये गिरमिटिया कहलाने लगे. इस एग्रीमेंट के तहत उन्हें एक तय समय में काम करके वापस आना था. पांच साल काम करके आ जाने वाले खुला कहे जाएंगे. मतलब एग्रीमेंट से वो फिर बाहर हो जाएंगे. साथ ही कहा गया था कि सामान्य तौर पर 10 साल के बाद ही वो लौट सकेंगे. इस दौरान उनका विवाह नहीं होगा और वो अलग-अलग तरीके की मजदूरी करेंगे. लेकिन अंग्रेजों के चंगुल में वो एक बार फंसे फिर वापस नहीं आ पाए, और जिन देशों में गए हमेशा के लिए वहीं के होकर रह गए.
गिरमिटिया मजदूरों की विदोशों में बसने की कहानी
साल 1829 में इन मजदूरों की पहली खेप समुद्र के रास्ते से एक मुश्किल भरी यात्रा के बाद मॉरीशस पहुंची. समुद्र इनके लिए एक नई बला थी. इनमें कईयों की मृत्यु तो इस विकराल यात्रा के बीच ही हो गई थी. सबसे ज्यादा पलायन बिहार, बंगाल, यूपी और तमिलनाडु से हो रहा था. ज्यादातर मजदूर इन्हीं राज्यों से थे. ये लोग फिजी, गुयाना, मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनीदाद-टोबेगो, जमैका, मलाया, सिंगापुर और अफ्रीका लाए गए. अंग्रेजों की ओर से श्रमितों की भर्तियों के लिए कलकत्ता और मद्रास में ऑफिस भी स्थापित किए गए. अपनी धरती से हमेशा के लिए बिछड़ना उनके लिए बेहद अमानवीय रहा था. साथ ही नई जगहों में हर तरह की सुविधाओं से वंचित रहते हुए मजदूरों की जिंदगी को जीना उनके लिए काफी कष्टदायी था. इसी दौरान उन्हेंने भोजपुरी, अवधी समेत दूसरी भारतीय भाषाओं में अपने दुख भरे गीत बुने. समय के साथ पिढ़ियां बदलीं, और अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर इन्होंने अपने नए देशों में अपनी सफलता का परचम लहराया है, और जिन देशों में मजदूर बनकर गए थे, वहीं वो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी बने.
भारतवंशियों ने विदेशों में फहराया कामयाबी का झंडा
इसके बाद बहुत से भारतीय व्यापार, शिक्षा और काम की तलाश में खुद से भी विदेशों में जाने लगे. पूरी दुनिया में वो तेजी से फैलते गए. हर जगह अपना नाम बनाने लगे. आलम ये हुआ कि 150 साल पूर्व जो भारतीयों को विदेशों में मजदूर के तौर पर बस रहे थे, वो आज दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिक और CEO बन बैठे हैं. गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला, पेप्सीको की पूर्व सीईओ इंद्रा नूई जैसे नाम इसके कुछ उदाहरण हैं. वहीं विदेशों में राजनीति में भी ये भारतवंशी खूब कामयाब रहे. ब्रिटेन के पूर्व पीएम ऋषि सुनक इसके एक बेस्ट एग्जांपल हैं. भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी डेटा के मुताबिक प्रवासी भारतीयों की आबादी 3 करोड़ 54 लाख है. इस आबादी में 19.5 मिलियन लोग भारतीय मूल वाले हैं, वहीं 15.8 मिलियन लोग एनआरआई के तौर पर रहते हैं.
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गिरमिटिया मजदूरों से 3.50 करोड़ प्रवासियों तक, जानें कैसे भारतवंशियों ने विदेशों में फहराया कामयाबी का झंडा