हाल के दिनों में ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें लोग डॉग बाइट का शिकार हुए हैं. यूं तो कुत्ते द्वारा इंसानों को काटे जाने की घटनाओं का एक समय तक विरोध करने के बाद, उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है. लेकिन मामला तब दूसरा रुख ले लेता है. जब ऐसे मामलों के चलते किसी इंसान को अपनी जान गंवानी पड़ती है. ऐसी स्थिति में या तो लोग कुत्ते को मारकर अपनी असंवेदनशीलता का परिचय दे देते हैं. या फिर उसे नगर निगम को सौंप देते हैं. लेकिन तब क्या जब बेदर्दी से इंसान की हत्या करने वाले कुत्ते को वापस लाने के लिए लोग खाना पीना छोड़ दें?
सुनने में भले ही यह विचलित करने वाला हो. मगर यूपी के कानपुर में जो चल रहा है, वो न केवल तमाम सवाल खड़े करता है. बल्कि ये भी बताता है कि आज इंसान रिश्तों से ज्यादा तरजीह अपने एनिमल लव को देता है.
दरअसल हुआ कुछ यूं कि कानपुर में होली के दिन एक 90 वर्षीय महिला को उसके ही जर्मन शेफर्ड कुत्ते ने मार डाला. अधिकारियों ने बताया कि महिला की मौत के कुछ ही दिन बाद, पीड़ित के पोते ने नगर निगम से पालतू कुत्ते को वापस करने की गुहार लगाई है. उसने कहा है कि कुत्ते को ले जाने के बाद से घर में कोई भी खाना नहीं खा पाया है.
घटना 14 मार्च को कानपुर के विकास नगर में हुई, जहां महिला मोहिनी त्रिवेदी अपने पोते धीरू प्रशांत त्रिवेदी और बहू किरण के साथ रह रही थी. उनके बेटे संजीव त्रिवेदी सेवानिवृत्त कर्नल हैं. परिवार का पालतू जर्मन शेफर्ड हाल ही में बहुत आक्रामक हो गया था. दरअसल, धीरू और किरण दोनों ही जानवर को नियंत्रित करने के पिछले प्रयासों के दौरान घायल हो चुके थे.
होली की शाम को, कुत्ते को खाना खिलाते समय, मोहिनी देवी पर जानलेवा हमला हुआ. जानवर हिंसक हो गया, उसने उसे काट लिया और मार डाला. पड़ोसियों ने तुरंत नगर निगम को सूचित किया, जिसकी टीम ने देर रात कुत्ते को पकड़ लिया.
महिला के पोते ने अब कानपुर नगर निगम से कुत्ते को वापस करने का अनुरोध करते हुए हलफनामा दायर किया है. अपनी याचिका में धीरू ने लिखा है कि, 'सर, कृपया मेरे कुत्ते को वापस कर दें. घर में कोई भी खाना नहीं खा रहा है. अगर भविष्य में कोई घटना होती है, तो मैं पूरी जिम्मेदारी लूंगा'.
हालांकि, नगर निगम के अधिकारी हिचकिचा रहे हैं. नगर निगम के पशु विभाग के प्रभारी डॉ. आरके निरंजन ने पुष्टि की कि कुत्ते के हिंसक व्यवहार की रिपोर्ट मिलने के बाद उसे पकड़ लिया गया था.उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि धीरू त्रिवेदी ने कुत्ते की हिरासत की मांग करते हुए एक हलफनामा प्रस्तुत किया था, लेकिन अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया.
उन्होंने कहा कि, 'कुत्ते के व्यवहार पर अभी भी नज़र रखी जा रही है.' कुत्ते ने विकास नगर में व्यापक दहशत पैदा कर दी है और निवासी डर में जी रहे हैं. कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि ऐसे जानवर को रिहायशी इलाके में वापस छोड़ना कितना सुरक्षित होगा.
कुत्ता किस हद तक खतरनाक था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुत्तों को पकड़ने के अभियान का नेतृत्व करने वाले नगरपालिका प्रभारी सुशील सिंह अब भी कुत्ते को लेकर खौफ में हैं.
उन्होंने बताया कि, 'जब हम पहुंचे तो कुत्ता इतना आक्रामक था कि हम घर में घुस नहीं सके. महिला का शव अंदर था. जब उसकी बहू ने किसी तरह कुत्ते को रोका, तभी हम उसका शव बाहर निकाल पाए. चूंकि परिवार ने औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी, इसलिए पुलिस कार्रवाई नहीं कर सकी.'
बहरहाल, जिस तरह कलयुगी पोते ने दादी के लिए नहीं बल्कि कुत्ते के लिए खाने पीने का त्याग किया है वो ये बताने के लिए काफी है कि बतौर इंसान हमारी संवेदनाएं सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित हैं. असल ज़िन्दगी में हमें रिश्तों-नातों की शायद ही कोई कद्र हो.
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