महाकुंभ हर मायने में अपनी तरह का एक अविश्वनीय त्यौहार है. आस्था के शानदार घोड़े पर सवार रंग-बिरंगे लोग बस चले आ रहे हैं. इस पर्व पर गौर करें तो मिलता है कि मां गंगा के प्रांगण में कोई भेद-भाव नहीं है. यहां बस भक्ति का जोर और जयकारे का शोर व्याप्त है.
बिन अतरंगी बाबाओं के कुंभ की चर्चा है अधूरी!
कुंभ बिना बाबाओं उनमें भी अतरंगी बाबाओं के जिक्र के बिना अधूरा है. यहां कोई IIT की डिग्री लिए है, तो कोई चिमटे से चिपकू यूट्यूबर को भगा देने वाला है. यहां एक साध्वी भी हैं जिन्हें लोग शादी की सलाह देते दिख रहे हैं. फिर चाय वाले बाबा भी हैं. 32 साल से बिना नहाये ही घूमने वाले भी हैं. विचित्रता से भरे हुए. दुनिया से बेखबर...
इन बाबाओं को देखने का भी अपना ही आनंद है. आप समझना चाहते हैं कि आदमी आखिर ऐसे कैसे बदल जाता है? कई बाबा तो इतने फैसिनेटिंग होते हैं कि उन्हें देखकर बाबा ही बन जाने का मन कर जाये. महसूस होता है कि क्या ही मजे की है जिंदगी इनकी.
इनको देखने पर ये भी महसूस होता है कि ये अपने टाइप के ट्रेवल इन्फ्लुएंसर ही तो हैं. बस इन्फ्लुएंस अलग वर्ग को कर रहे हैं. ये बाबा लोग महिलाओं को ज़्यादा प्रभावित करते होंगे या पुरुषों को या किशोरों को? इस सवाल का कोई स्पष्ट डेटा तो नहीं है लेकिन कुंभ में पुरुषों की भीड़ अधिक दिख रही है तो शायद उन पर ही इन बाबाओं का ज्यादा प्रभाव होगा. किशोरों के लिए कौतुहल का ही मामला बनेगा.
ये एक तरह की मान्यता है लेकिन हर बात पर बहस हो ही, ये किसने कहा है? हम जैसे शहरी जनों की मोटी चमड़ी पर तो रेत भी फिसल जाती है. गंगा जी के बालू की बात अलग है वैसे.
बहरहाल, सौ बातों की एक बात. ये अजीबो-गरीब बाबा लोग जो कौतुक करते हैं, उनका आप पर कोई असर पड़ता है क्या? घर-संसार छोड़ कर पर्वत पार चले जाने का मन करता है? एक लाख आदमी में से किसी एक पर तो पड़ ही जाता होगा, नहीं?
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महाकुंभ में आने वाले अद्भुत बाबा लोग फैसिनेटिंग तो हैं, लेकिन किसके लिए?